Kim lane

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Written on 11:00 PM by KAMAL

किम लेन


(कमल)

‘‘देखो अपने जीवन में पहली बार, वो भी कंपनी के काम से मुझे पटना आना पड़ा वर्ना कहाँ चंडीगढ़ और कहाँ पटना? मैंने तो बस इसका नाम ही सुना था। दिल्ली से आगे इधर मैं आज तक कभी नहीं आयी। फिर शनिवार-रविवार को तुम मुझे बोध गया घुमा दोगे, इस लालच में मैंने अपनी वापसी का रिजर्वेशन बाद का कराया, वर्ना अभी मैं ट्रेन में होती।’’
‘‘ हो, तो तुम मुझसे मिलने नहीं, अपना बुद्ध देखने को रुकी हो?’’ अमर ने बनावटी गुस्सा दिखाया।
‘‘...लो अब इनकी सुनो ! मुझे कहाँ पता था कि पटना से जा कर बोध गया देखा जा सकता है? वह तो तुमने ही बताया था। हां यह तुम कह सकते हो, बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति स्थल को देखने का लोभ मुझे हो गया। वर्ना मैं तो गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म-स्थान, पटना साहिब ही देख कर लौट जाती।
बातें करते-करते वे बढ़े जा रहे थे। सैलानियों और बौद्ध धर्मावलंबियों का बढ़ता घनत्व, सदियों पुराने पत्थरों से बने उस मंदिर के पास आते जाने का संकेत दे रहा था। महाबोधि मंदिर काफी गहराई में होने के कारण बहुत पास पहंुच जाने तक भी नजर नहीं आता। जैसे ही वे छोटे से उस बाज़ार से दांये मुड़ कर सामने पहुँचे, तब तक नजर ना आने वाला मंदिर अचानक ही मानों धरती फाड़ कर उसके सामने उग आया हो। विस्मित सिम्मी की आंखें फैला गईं, ‘‘.....हो ...इतना सुंदर ...इतना भव्य! हाऊ ब्यूटिफुल!’’
मंदिर के कलात्मक शिल्प को देख सिम्मी हैरान थी। नीचे को जाती सीढि़यों पर उतर कर वे मंदिर के प्रवेश द्वार तक पहुँचे। चारों तरफ इतिहास बिखरा पड़ा था। शायद दोपहर का समय होने के कारण भीड़ कम थी। भीतर गहरी शांति और आकर्षक रोशनी में सामने छाती तक ऊँचाई वाले चबूतरे पर ध्यान-मुद्रा में बैठी बुद्ध की आकर्षक और भव्य प्रतिमा मंदिर के अंदर एक पवित्र, अलौकिक वातावरण का निर्माण कर रही थी।
‘‘हम लोग थोड़ी देर यहां बैठेंगे।’’ कह कर सिम्मी पाल्थी मार कर आहिस्ते-से बैठ गई।
उसके ठीक पीछे जगह देख अमर भी बैठ गया। मंदिर का सेवक स्वच्छ पानी से बुद्ध की प्रतिमा के आस-पास चबूतरे की साफ-सफाई कर रहा था। अगरबŸाी के साथ-साथ फिनायल की भीनी-भीनी खुशबु वातावरण में फैली रही थी। बाहर की झुलसाती गर्मी की अपेक्षा भीतर की ठंढक में बैठना बड़ा भला लग रहा था। थोड़ी देर बाद सिम्मी की देखा-देखी अमर ने भी अपनी आँखें मूंद लीं।
कुछ देर बाद जब वे बाहर आये तो सिम्मी के चेहरे पर बड़ी संतुष्टि का भाव था, ‘‘मुझे वहां फूलों की अद्भुत, मोहक सुगंध रही थी। ऐसी अनुभूति मुझे इससे पहले कहीं नहीं हुई।’’
‘‘मुझे तो वहां फिनायल की गंध रही थी।’’ अमर मुस्कराया।
‘‘नास्तिक कहीं के !’’ सिम्मी ने उसे उसकी औकात बताई।

मंदिर की परिक्रमा करते हुए वे बोधि वृक्ष के पास पहुंचे। चारों तरफ विभिन्न देशों से आये बौद्ध अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार ध्यानरत् थे। उनके गेरुए, गहरे कत्थई और सफेद रंग के वस्त्र भी उनकी भिन्नताओं को बता रहे थे।

‘‘यही वृक्ष है जहां ईसा से भी 623 वर्ष पहले सिद्धार्थ ध्यान किया करते थे। उन्हें संबोधि-ज्ञान बैसाखी पूर्णिमा की उस रात प्राप्त हुआ था, जिस दिन सुजाता नाम की कुलीन स्त्री ने उन्हें श्रद्धापूर्वक खीर खिलायी थी। तब से पहले कोई नहीं जानता था कि पूर्णिमा की वह रात आगामी कई शताब्दियों तक मानव सभ्यता के लिए अनूठी हो जाने वाली थी। उस पूर्णिमा की अगली सुबह वे मात्र सिद्धार्थ नहीं थे, बुद्ध बन चुके थे। आजवज्रासन ज्ञानस्थलीके नाम से प्रसिद्व यह स्थल बौद्ध वंदना का प्रमुख स्थान है।’’ अमर ने वहां लिखी सूचना में अपनी बातें जोड़ कर गाईड बनते हुए कहा।

थोड़ा आगे बढ़ दांये मुड़ने पर पत्थर का एक लंबा चबूतरा था, जिस पर कतार से पत्थर के कमल बने हुए थे। अमर ने गिना एक... दो... तीन... चार... पूरे उन्नीस कमल! अमर ने पास के सूचना पट्ट से पढ़ सुनाया, ‘‘भगवान बुद्ध ने यहां ध्यानस्थ चंक्रमण करते हुए तीसरा सप्ताह बिताया था। चबूतरे पर बने कमल उन स्थानों का संकेत हैं जहां उनके चरण पड़े थे।’’ मुड़ कर उसने सिम्मी को देखा। मगर उसका ध्यान तो कहीं और ही था। वह खामोशी से सब कुछ निहार रही थी। उसके चेहरे पर गहरी श्रद्धा और अलौकिक चमक दिख रही थी। अमर ने उसे टोकना चाहा, फिर जाने क्या सोच कर चुप-चाप उसके पीछे चलता रहा।

सामने से कुछ विदेशी सैलानी रहे थे। अचानक ही सिम्मी ने उनमें से एक महिला को टोका, ‘‘हलो! व्हेयर फ्राम ?’’
छोटी-छोटी आँखों और गर्दन तक कटे बालों में घिरे गोल चेहरे वाली वह महिला अचकचा कर रुक गई। फिर सिम्मी की मुस्कान पर सहज होते हुए उसने चीनी उच्चारण वाली अंग्रेजी में जवाब दिया, ‘‘हलो! आयम किम लेन फ्राम चाइना।’’
‘‘वेलकम टू इंडिया। एन्जायिंग आवर कंट्री ?’’
‘‘ ...येस ...येस। वर्शिपिंग लार्ड बुद्धा!’’ कह कर मुस्कराती हुई वह आगे बढ़ गई।
‘‘कर ली दोस्ती चीनी से ?’’ अमर बोला।
‘‘हां जी, कर ली। जाने क्यों अचानक ही सामने आई चीनी गुडि़या-सी, वो इतनी अच्छी लगी कि मैं टोके बिना रह पायी।’’
‘‘हां, वो वाकई प्यारी थी। मेरा भी मन उसे टोकने को कर रहा था।’’ अमर ने शरारती मुस्कान से कहा।
‘‘खबरदार मेरे सामने तुम्हें ऐसी बातें करते शर्म नहीं आती ?’’ सिम्मी उबली।
‘‘शर्म ? क्यों-क्यों ? तुम मेरी दोस्त हो ! कोई प्रेमिका या पत्नी तो हो नहीं, जो शर्म करुँ।’’ अमर ने पलटवार किया।
सिम्मी हथियार डालते हुए बोली, ‘‘...तुम नहीं सुधरोगे!’’
‘‘मुझे सुधारना चाहती हो ? अच्छा बताओ... तुम मेरे लिए दोनों में से क्या बनाना चाहोगी ?’’अमर के होठों पर मुस्कान थी।
‘‘...फिलहाल तो दोस्त ही ठीक है। अगर दोनों में से किसी के भी लायक साबित हुए तो वो भी बना लिया जाएगा। प्रतीक्षा करो ...हा...हा....हा।’’ कहते हुए वह खिलखिला उठी। अमर के कानों में उसकी हंसी, संगीत की तरह जैसे पंजाब के गिद्दे और टप्पों का रस घोलती चली गई।

मंदिर परिसर से बाहर आते हुए उसने पूछा, ‘‘...अच्छा एक बात बताओ। बौध-धर्म हमारे देश में जन्मा फिर तिब्बत, बर्मा, थाईलैंड, चीन, जापान, कोरिया आदि देशों की तुलना में अपने ही देश में यह फ्लाॅप क्यों हो गया?’’
‘‘देखो तुम जो पूछ रहे हो उसके उत्तर में बौध धर्म के जानकार जाने कितनी बातें कह डालें। मगर मेरे लिए तो बुद्ध का तात्पर्य एक धर्म की सीमा में कैद होने से नहीं है। मेरे लिए बुद्ध का विस्तार समूचे आकाश, आकाश गंगा और पूरे ब्रह्माण्ड से भी आगे है। मैं जब उनका ध्यान करती हँू तो उनके चेहरे पर छायी शांति, उनकी अध-मुंदी पलकें, उनके चेहरे का तेज सब कुछ अलौकिक लगता है। बस उनके ध्यान भर से मेरे मन का खालीपन पूरा का पूरा भर जाता है।’’
बातें करते हुए वे बाहर निकल आये। वहां कई दुकाने थीं। कुछ पक्की तो कुछ फुटपाथ पर ही लगी।
कुछ विदेशी बौद्ध एक पिंजरे वाले के पास खड़े थे। पिंजरे वाले ने उनसे रुपये लिए और अपने पिंजरे का द्वार उनकी ओर कर दिया। उन लोगों ने एक-एक कर सारे पक्षी हवा में उड़ा दिये।
‘‘कुछ समझे?’’ सिम्मी ने उससे पूछा।
अमर के इंकार में सर हिलाने पर वह बोली, ‘‘इस प्रकार वे पक्षियों को मुक्त कर अपनी करुणा प्रकट कर रहे हैं। ये भी उनकी धार्मिक आस्था का एक रुप है।’’ उनकी कार स्टार्ट हो चुकी थी।
कुछ आगे पाँच मंजिला भवन जितनी ऊँची पत्थर से बनी विशाल बुद्ध प्रतिमा देख सिम्मी का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। प्रतिमा के चारों ओर घेर कर खड़े उनके शिष्यों की प्रतिमाएं भी दो मंजिला भवन से कम ऊँची थीं। खुले आकाश में उनकी भव्यता अनूठी लग रही थी।
उसके बाद वे थाइलैंड, चीन, तिब्बत आदि देशों के मठ देखते रहे। विभिन्न देशों के अपनी-अपनी संस्कृति में रंगे बौद्ध मठों को देखते हुए यही अहसास होता कि आप उन देशों में हैं।
चारों तरफ घूम-घाम करते उन्हें शाम हो गई। दूर कहीं ढलते सूरज और नारंगी से धंुधले होते क्षितिज वाले दृश्य के उस वातावरण में धीमी-धीमी बहती हवा पर उतरती सुरमई शाम, प्रकृति की अनमोल कविता रच रही थी।


अगली सुबह बोध गया छोड़ने से पहले सिम्मी स्मृति स्वरुप कुछ खरीददारी करना चाहती थी।
एक दुकान पर लस्सी पीती सिम्मी चैंकी, ‘‘अरे...वह पिंजरा लिए तो कल वाला ही आदमी है।’’
‘‘हां, है तो वही। तो क्या हुआ ? यहां होना उसका रोज का काम है।’’ अमर ने भी उसे पहचाना।
पक्षियों को गौर से देखती सिम्मी बोली, ‘‘मैं उसकी नहीं, पक्षियों की बात कर रही हूँ। उसके पिंजरे में सारे कल वाले ही पक्षी हैं।’’
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? वह पक्षी तो कल ही उन लोगों ने उड़ा दिये थे। दूसरे पक्षी होंगे। तुमसे पक्षी पहचानने में भूल हो रही है।’’
‘‘पक्षी पहचानने में भूल? व्हाट नाॅनसेंस? हुजूर सुखना लेक मेंबर्ड-वाचिंगकी मैं एक्सपर्ट हूं। मुझसे भूल नहीं हो सकती। मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि उसके पिंजरे में वही कल वाले पक्षी हैं।’’
‘‘मगर ऐसा कैसे हो सकता है ? ’’
‘‘मैं भी वही सोच रही हूँ। लेकिन कल सब यही पक्षी उसने अपने पिंजरे की कैद से मुक्त किये थे।’’ सिम्मी ने दृढ़ता से कहा, ‘‘लगता है वह विदेशी सैलानियों की श्रद्धा का गलत फायदा उठा रहा है।’’
‘‘अगर ऐसा है, तब तो हमें उसे सबक सिखाना ही चाहिए’’ वे दोनों उसकी ओर बढ़ गये।

‘‘यही पक्षी तुम्हारे पास कल भी थे ?’’ अमर ने सीधा सवाल किया।
उसने उत्तर देने से पहले उन्हें ऊपर से नीचे तक बड़े ध्यान से देखा फिर पूरे शांत स्वर में बोला, ‘‘मेरे पक्षी हैं तो मेरे ही पास रहेंगे।’’
उसके शांत स्वर से अमर गड़बड़ा गया। मगर फिर आक्रामक हो कर बोला, ‘‘मेरा मतलब है कल यही पक्षी विदेशी बौद्धों ने लेकर उड़ाये थे ? और उसके बदले में तुमने रुपये भी लिए थे ?’’
‘‘हाँ पक्षियों को यूँ मुक्त कर वे प्रसन्न होते हैं। मैं सिर्फ दो सौ रुपये में उन्हें शांति प्राप्त करने का अवसर देता हूँ, जिसे पाने को वे यहां आते हैं।’’ उसने वैसे ही शांत भाव से उत्तर दिया।
‘‘मगर वही पक्षी तुम फिर से कैसे अपने पिजरे में ले आये ?’’ सिम्मी ने अमर को शांत करते हुए जानना चाहा।
‘‘वे मेरे पालतु पक्षी हैं। यहां से उड़ कर सीधे मेरे घर पहुँच जाते हैं। फिर मैं उन्हें पुनः पिंजरे में डाल कर ले आता हूँ। बार-बार पक्षियों को पकड़ने जंगल जाना पड़े तो हम भूखे मर जाएं। अब वैसे जंगल बचे हैं, पक्षी।’’
‘‘...यानि कि पक्षियों की रिसाईकिलिंग ?’’ सिम्मी चैंकी।
अमर ने उत्तेजित होते हुए कहा, ‘‘मगर वे समझते हैं, जंगल के पक्षियों को मुक्त कर रहे हैं। तुम्हें उनकी भावनाओं से धोखा करते शर्म नहीं आती?’’
तभी किम लेन उनकी तरफ आती दिखी।
‘‘देखो साहब मेरे धंधे का समय है, क्यों परेशान कर रहे हैं ?’’ वह लगभग रिरियाते हुए बोला। अमर की बहसबाजी से वह घबरा गया था।
फिर वह उस महिला को पिंजरा दिखाते आवाज लगाने लगा, ‘‘...ब्यूटिफुल बर्ड.... ब्यूटिफुल बर्ड !’’
किम लेन उनके पास कर रुक गई।
पिंजरे वाले ने जाने क्या किया कि सारे पक्षी अचानक ही बेचैनी से इधर-उधर पंख फड़फड़ाते चहचहाने लगे।
किम लेन ने पिंजरे वाले की ओर देखा। वह तपाक से बोला, ‘‘ओनली टू हंड्रेड!’’
‘‘.के.’’बोलती किम लेन ने अपनी कमर की बेल्ट में लगे बटुए की ओर हाथ बढ़ाया।
अमर को लगा उसे धोखे से बचाना चाहिए, ‘‘लुक लेडी, ....दे आर नाॅट जेन्यूइन बर्ड्स ...दे आर पेट बर्ड्स...ही इज चीटिंग (देखिए वे आपकी वाँच्छित चिडि़या नहीं हैं ....वे पालतू चिडि़या हैं ...वह धोखा कर रहा है...)’’
पिंजरे वाला फट पड़ा, ‘‘देखिए आपके ये रिसाइकिलिंग, धार्मिक भावना, धोखा आदि मैं नहीं जानता। ये मेरा धंधा है जिससे मैं अपने परिवार की भूख मिटाता हँू।’’
अमर शायद, कुछ जवाब दे कर, उससे उलझने को तैयार हो रहा था। मगर उसने किम लेन की आवाज सुनी, ‘‘प्लीज...प्लीज...’’ और वह चुप रह गया।
स्थिति संभाल लेने के बाद किम लेन ने बारी-बारी से अमर, सिम्मी और पिंजरे वाले को देखा फिर रुपये निकाल कर पिंजरे वाले के हाथ पर रख दिए थे। पिंजरे वाले ने फुर्ती से पिंजरे की खिड़की किम लेन के सामने कर दी।
किम लेन के होठों पर पतली-सी मुस्कान उभर आयी थी। आंखें बंद कर उसने पिंजरे की ओर हाथ जोड़े। थोड़ी देर तक कुछ बुदबुदाती रही। उसके बाद उसने पिंजरे की खिड़की खोली और एक-एक कर पंछियों को उड़ाने लगी।
‘‘बड़ी अजीब है।’’ अमर ने बुरा-सा मुँह बनाते हुए सिम्मी की ओर देखा।
‘‘छोड़ो यार जाने दो। इन विदेशियों के पास बहुत सारा फालतू पैसा होता है। जैसे चाहें उड़ायें, हमें क्या?’’
वे दोनों होटल की ओर बढ़ गये। लौटने से पहले खाना भी खाना था।

‘‘मेरी ट्रेन रात आठ बजे है। तुम्हारी ?’’
‘‘तुम्हारे काफी बाद, रात साढ़े दस बजे।’’ अमर बोला, ‘‘घबराओ मत तुम्हेंसी-आॅफकर के ही मैं पटना छोड़ूंगा।’’
‘‘हाय मैं मर जावाँ गुड़ खा के तेरे इससी आफपे। अच्छा एक बात बताओ, अगर तुम्हारी आठ और मेरी ट्रेन साढ़े दस बजे होती, तब क्या मुझेसी आफकरने के लिए अपनी ट्रेन छोड़ देते?’’ सिम्मी ने चुटकी ली।
‘‘कभी आजमा लेना।’’ अमर ने भी उसे चिढ़ाने के अंदाज में जवाब दिया।

खाना खा कर वे कार में बैठ रहे थे, जब सामने से किम लेन आती दिखी। वह मुस्कराई और हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘नमस्ते !’’
सिम्मी और अमर चैंके, ‘‘अरे आप ... हिन्दी ......?’’
उन दोनों की हैरानी को बीच में ही काट कर वह मुस्कराई,‘‘मैं बीजिंग में हिन्दी पढ़ाती हूं।’’
सिम्मी ने पूछा, ‘‘तब तो आपने चिडि़यों वाले के पास हमारी सारी सुन ली होंगी।’’
‘‘जी हां ! सुनी भी और समझ भी लीं।’’ चीनी गुडि़या मुस्कुरा रही थी।
‘‘तो आपने चिडि़यों वाले के धोखे को जान कर भी, उसे क्यों पैसे दिये ? और हां, आपने वहां कुछ कहा भी नहीं।’’ अमर ने उस चीनी मुस्कान को नजरअंदाज कर पूछा ही लिया।
‘‘मैं क्या बोलती, वहां तो आप दोनों ही मेरी तरफदारी कर रहे थे। ऐसे में मेरा बोलना जरुरी कहां था?’’ किम लेन की मोहक मुस्कान कुछ शोख हो गई।
‘‘अरे वाह... आपके साथ कोई धोखा करे, आपको मूर्ख बनाए और आप कुछ नहीं बोलेंगी?’’ अमर अभी तक उससे नाराज दिख रहा था।
किम लेन ने बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और बोली, ‘‘...भाई, आप नाराज मत हों। पिंजरे वाला तो धोखे से सिर्फ अपने परिवार का पेट भरता है। हम छोटे धोखों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। लेकिन उन करोड़ों, अरबों के बड़े धोखों पर ध्यान क्यों नहीं देते, जिनके कारण भूख, गरीबी और बीमारी पैदा होती है ? बड़े धोखे करने वाले केवल अपनी तृष्णा के कारण दूसरों के लिए भूख, गरीबी और बीमारी पैदा करते हैं। उस तृष्णा के लिए, जो कभी भी नहीं मिटती।’’
‘‘मिस किम लेन, माफ कीजिएगा। लेकिन धोखा तो धोखा होता है। ये छोटे-छोटे धोखे ही आगे जा कर बड़े धोखों में बदलते हैं।’’ अमर ने विरोध किया।
कुछ सोचते हुए वह बोली, ‘‘शायद आप भी ठीक कह रहे हैं। लेकिन मेरे लिए तो धोखा वह बुरा होता है जो भूख, बीमारी, पीड़ा, अशांति और दर्द दे, जीवन से हमारा विश्वास छीन ले। वह धोखा बुरा कैसे होगा, जो भूख खत्म करे, आराम दे, शांति दे और इस सुंदर जीवन पर हमारा विश्वास दृढ़ करे!’’
‘‘जैसा आप कह रही हैं, क्या सब कुछ इतना ही सरल है ?’’ अमर ने पूछा।
‘‘यह तो अपने-अपने विश्वास की बात है। खैर आप लोगांे से मिलना अच्छा लगा। बुद्ध आपको शांति दें। अच्छा नमस्ते!’’
उनके हाथ भी नमस्ते की मुद्रा में जुड़ गये। किम लेन चली गई।

उनकी कार बोध गया को पीछे छोड़, मुख्य सड़क पर तेजी से पटना की ओर बढ़ रही थी। सिम्मी के चेहरे पर बोध गया देख लेने की संतुष्टि थी। लेकिन अमर चुप-चुप और बेचैन लग रहा था।
‘‘क्या बात है ? बहुत चुप हो। किम लेन याद रही है ?’’ सिम्मी ने उसे छेड़ा।
‘‘हाँ, लेकिन उस रुप में नहीं जिस रुप में तुम सोच रही हो।’’ अमर का स्वर गंभीर था।
सिम्मी उसकी गंभीरता पर चैंकी, ‘‘क्या बात है अमर, इतने उदास क्यों हो ?’’
‘‘जब तक भूख रहेगी, तब तक धर्म रहेगा और धोखा भी!’’ अमर ने पीछे अपनी सीट पर सर टिकाते हुए आँखें मूंद लीं।

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(कमल)

संपर्कः- डी-1/1 मेघदूत अपार्टमेंट्स, मेरीन ड्राइव रोड, पो0- कदमा, जमशेदपुर-831005 (झारखंड)

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