Written on 3:05 AM by KAMAL
तीसरा सपना
न चाहते हुए Òी Òुजंग दम साÌे पल्टू के पीछे खतरनाक पहाड़ी पर बढ़ा जा रहा था। उस बेहद कठिन सूत-सी पतली पगडंडी पर जरा Òी चूक का अर्थ था, सैकड़ों फीट गहरी खाई में गिरना। लेकिन ‘उस’ तीखे मोड़ के नजदीक आते ही Òुजंग की Äबराहट बढ़ने लगी। काफी प्रयत्नों के बावजूद उसका ध्यान Òटकने लगा।
ßमैंने कहा Éा न मुझे जाने दो, मगर तुम नहीं माने। अब बताओ तुम कैसे बचोगे?Þ गुस्से से लाल आंखों वाले पल्टू का अट्टाहास गहरी खाई में गूंजता चला गया।
पसीने मेंे सराबोर Òुजंग का रहा-सहा हौसला Òी टूट गया। उसके कदम लड़खड़ाये। पांव फिसलने की देर थी, वह झटके से गहरी खाई में गिरने लगा। उसके मुँह से मौत की डरावनी चीखें उबलने लगीं। वह बचने के लिए चारों तरफ हाथ-पांव मारने लगा। परन्तु उसके चारों तरफ पल्टू का अट्टाहास करता डरावना चेहरा Äूम रहा था। Òुजंग का शरीर तीवzता से गहरी खाई में गिरता जा रहा था।
इसके पूर्व कि पथरीली, नुकीली चट्टानों से टकरा शरीर टुकड़े-टुकड़े होता, उसकी नींद खुल गई। वह बुरी तरह हांफ रहा था। टटोल कर उसने लैंेप जलाया और पानी की बोतल उठा मुँह से लगा ली। गट~...गट~...गट~...पानी की ठंढक गले से होकर पेट में उतरी तो ज+ोरोें से धड़कते दिल ने कुछ राहत महसूस की। Ìीरे-Ìीरे वह प्रकृतस्थ होने लगा।
पिछली तीन रातों से लगातार वही सपना उसे परेÓान कर रहा है। अब यह बात उसके मन में Äर करने लगी है कि जब तक पल्टू हवालात में बंद है, सपने में यूं ही उसे परेशान करता रहेगा। पल्टू को छुड़वा गाँव वापस Òेजना ही होगा। कल सुबह ही दूÌ बेचने का काम खत्म कर वह थानेदार से मिलेगा। ऐसा सोच वह लेट गया परन्तु नींद उससे कोसों दूर थी। पल्टू उसके दिलो-दिमाग पर बुरी तरह छाया हुआ था। ये है कहानी का सपना नंबर एक।
संÒवत: अब आप Òी पल्टू के बारे में जानना चाहते होगें। लेकिन पल्टू से पहले Òुजंग के बारे में जानना ज+रुरी है। यंू समझिए कि Òुजंग के बिना पल्टू की कहानी प्रारंÒ ही नहीं हो सकती।
Òूतकाल की पड़ताल से Òुजंग का इतिहास बहुत लंबा नहीं मिलता। सिवाय इसके कि कहीं दूर से, जहां उसका लंबा-चौड़ा दूÌ -व्यापार चलता था, कई वर्ष पूर्व वहाँ आ बसा है। वहां वाले गुर यहाँ के व्यापार में प्रयोग कर उसका वर्तमान सुदृढ़ बन चुका है। वो वर्तमान उसके सुरक्षित व समृद्ध Òविष्य का गवाह Òी है।
उन दिनों वह कुछ बीमार गाय-Òैसों के साथ आया था। बल्कि यूँ कहें कि अपने बीमार जानवरों के कारण उसे पूर्व की जगह छोड़नी पड़ी थी। शरीर पर अज+ीब से चकते उनकी बीमारी के प्रमाण थे। उनके दूÌ में Òी पहले जैसी पौष्टिकता न थी। इन्हीं कारणों से पिछली जगह पर उसका दूÌ प्रतिबंÌित हुआ था। उनका ईलाज करवाने की जगह वह अपने बीमार जानवरों से होने वाली आमदनी त्यागने को तैयार न था। तब उसने यहां का रास्ता पकड़ा जहां के लोग चमक दमक पर ही ज्यादा ध्यान देते थे।
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वह प्रचार युग था। तेज+ रोÓनियों, चमकदार रंगों और सुंदर बालाओं वाला प्रचार-युग। प्रचार-बालाएं जो सदा टी.वी, पत्रिकाओं और बड़े-बड़े हो²डगों पर लहराती हुई बला बनी रहतीं! सुंदरियाँ Òी ऐसी जिनके रसीले होंठों से झाँकती श्वेत दंत-पंक्ति वाली तिरछी मुस्कानें, नÓीली आँखें, वक्ष से कटि तक की प्रत्येक उठान और ढलान, उनके उठने-बैठने व चलने का अंदाज आदि सांैदर्य विÓेÔज्ञों द्वारा पूर्व में ही जांचे औेर पास किये गये। बस यूँ समझ लें कि स्वर्ग की अप्सराओं को मात करती उन प्रचार-बालाओं की एक अदा के सामनेे पूरी की पूरी मेनका फेल।
उन अप्सराओं द्वारा Òुजंग नेे अपने दूÌ का ऐसा प्रचार करवाया कि सब तरफ सनसनी फैल गईं। अपनी दिलकÓ अदाओें वाले पोस्टरों में वे लोगों को ऐसी दिखतीं मानों Òुजंग नहीं वे सुंदरियां ही दूÌ बेच रही हों। उनके आकर्Ôण से हर कोई खिंचा चला आने लगा। जब वे प्रचार-बालाएं टी.वी.पर उस दूÌ की विÓेÔताएं लगातार बताने लगीं तब Òला लोगों को बीमार जानवर और खराब दूÌ कैसे नजर आते? अब मदहोÓ आँखों, रसीले होंठों, कामुक अदाओं की बात कौन ठुकरा सकता था? उन बालाओं ने तो यहाँ तक बताया कि Òुजंग के दूÌ में ऐसे-ऐसे पौष्टिक तत्व हैं, जिनकी लोगोें ने पूर्व में कÒी कल्पना तक न की होगी। ...इस प्रकार Òुजंग को वहां के दूÌ-बाज+ार पर अपना एकछत्र राज स्थापित करने में कोई खास कठिनाई न हुई। यही तो तिलिस्म है प्रचार का, जो मिट्टी को Òी सोना बता, बेच देता है!
व्यापार में माहिर Òुजंग कई तरह के आWफर Òी देता रहता था। जैसेे कि दो लीटर दूÌ के साथ चौथाई लीटर Ýी और चार लीटर के साथ आÌा लीटर Ýी। खूब चमकदार खटाल में Åँचे टाइल्स जड़े चबूतरे पर बैठ, Òुजंग स्टाइल से दूÌ बेचा करता। प्रतीक्षारत गzाहकों के लिए अखबार पढ़ने की अतिरिक्त सुविÌा Òी थी। ÓीÄz ही उसके दूÌ की Ìाक चारों तरफ फैलने लगी। Òुजंग ने किला फतह कर लिया था।
उसने जिस तेजी से अपने काम निपटाए, हतप्रÒ स्थानीय दूÌ विक्रेताओं को कुछ Òी समझ न आया। बड़े-बड़े अÌिकारियों की पत्नियाँ जब Òुजंग के दूÌ की Ìार में बहीं तो उन्हें अचानक स्थानीय दूÌ विक्रेताओं के वही खटाल गंदे तथा अनाÌिकृत लगने लगे, जहाँ से उनकी आज तक सारी दूÌ-आवश्यकताएं पूरी हुआ करती थीं। वहीं से बात आगे बढ़ी और अतिक्रमण हटाने तथा Óहर-सुंदरीकरण के नाम पर उन सब को Óहर की सीमा के बाहर खदेड़ दिया गया। परिणामत: Óहर से बाहर जा दूÌ लाने की कठिनाई न उठा सकने वाले सÒी लोगों केे लिए Óहर में रह गये Òुजंग का दूÌ ही एकमात्र विकल्प बचा था। जहां साफ-सुथरे और चमकदार खटाल की बाहरी दीवारों पर लगे मादक प्रचार-बालाओं के बड़े-बड़े पोस्टर पूरे Óहर को दूÌ पिलाने का आमंत्रण देते प्रतीत होते।
हालाँकि चर्चा थी कि Òुजंग Òी अतिक्रमित जमीन पर है। लेकिन उसकी Óक्तिÓाली सेटिंंग के सामने सब नियम-कानून मुँह बाये खड़े थेे ¼समरथ के नहीं दोÔ गुसांई....½। इस प्रकार स्थानीय दूÌ वालों के सामने केवल दो विकल्प बचे। पहला कि वे अपना बोरिया-बिस्तर समेट कहीं और चले जाएं और दूसरा कि वे अपना दूÌ Òुजंग की Óर्तों पर उसे दे दिया करें, जैसा कि उन्हें आWफर मिल चुका था। पहले विकल्प के बारे में वे सोच Òी नहीं सकते थे। अंतत: सब ने अपना दूÌ Òुजंग को बेचना स्वीकार कर लिया था।
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लेकिन असल कहानी यहाँ से Òी नहीं Óुरु होती। वह Óुरू होती है लगÒग दो सौ मील पूर्व में बसे वर्मा जी के गाँव, मेरा मतलब है पल्टू के गाँव से। गर्मी की छुट्टियाँ जहां से सपरिवार बिता, Óहर लौट रहे वर्मा दंपत्ति को एक विश्वासी नौकर की आवश्यकता थी।
‘‘पल्टू के बापू, उसे हम खाना-कपड़ा के अलावा प्रतिमाह सौ रुपये नकद देंगे।’’
वर्मा जी की बात सुन, गदगद पल्टू के बापू ने अपने दोनों हाथ जोड़े, ‘‘हुजूर, पल्टू तो आपका ही बच्चा है।’’
‘‘तब ठीक है, यह लो छ: माह का एडवांस।’’ वर्मा जी ने सौ-सौ के छ: करारे नोट उसकी हथेली पर रख दिये।
जब पल्टू को पता चला, उसका मन-मयूर नाच उठा। तब तक उसने Óहर के केवल किस्से-कहानियाँ ही सुने थे। Åँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमचमाती गाड़ियाँ, चमकते-दमकते लोग। वहां गाँव का कादो-कीचड़ थोड़े न होता है! ...और पल्टू Óहर आ गया था...अपने सपनों के Óहर...Óहरी लोगों के बीच!
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Óहर पहँुचते ही उसकी ट्रेनिंग आरंÒ हो गई। वह बड़ा समझदार साबित हो रहा था। जैसे-जैसे वह काम समझता जाता, वर्मा दंपत्ति के कार्य आसान होते गये। हालाँकि पल्टू के लिए सारी चीजें उतनी आसान न थीं। जब वह पहली बार मेम साहब के साथ बाज+ार गया, सब्जी वाले से उलझ गया था। थैले में पड़ी सब्जी को जब उसने हाथ से तौला, इसमें वह महिर था, उसे वह काफी कम लगी। सब्जी वाला मालकिन को ठग रहा है, ऐसा सोच वह सब्जी दोेबारा तुलवाने को अड़ गया था।
‘‘अइसे ही लेना है तो लो वर्ना छोड़ दो। बड़े आये सब्जी दुबारा तुलवाने वाले।’’ उसकी बात सुन सब्जी-वाला आग-बबूला हो गया।
उसके जी में आया, सब्जी वाले का सर फोड़ दे। परन्तु यह देख हैरान रह गया कि मिसेज वर्मा सब्जी वाले को कुछ बोलने की जगह उसे ही खींचती आगे बढ़ गई।
जब एक दिन वर्मा जी के साथ राÓन ले कर लौटते ही उसने कुछ सामानों के पैकेट हाथ में उठा, न सिर्फ उनमें वजन कम होने की बात कही, बल्कि Äर में पड़े तराजू से तौल कर उसे प्रमाणित Òी किया तो Óाबासी की अपेक्षा कर रहा पल्टू यह जान दंग रह गया कि कम वजन की बात उसके साहब और मेम साहब दोनों जानते हैं। उन्होंने समझाया कि दुकानदार की मनमानी न सहने का अर्थ है, कहीं ज्यादा दूर से राÓन लाना, जो उनके लिए संÒव नहीं हैे। फिर उस दूसरी दुकान पर Òी वजन के सही होने की क्या गारंटी? Óहर की इस Òाग-दौड़ वाली जिंदगी में जहाँ Òी और जैसेे Òी मिले हम सामान ले लेते हैं। तÒी पल्टू को दुकान की छत पर लगा बोर्ड याद आया- ‘सही वजन और सही दाम की एकमात्र दुकान।’
‘‘एक बार...।’’ वर्मा जी ने अपनी स्मृति पर जोर डालते हुए बताया, ‘‘मैंने राÓन वाले को कम वजन के लिए टोका था। उसने कहा तो कुछ नहीं लेकिन ऐसा सामान देने लगा, जिसमें काफी कंकड़ रहते। यदि वैसा सामान मैं ले आÅँ तब उसे साफ कौन करेगा? माना मेहनत करके उसे साफ कर Òी लें तो निकले कंकड़ों के वजन बराबर कमी हो गई न! अब तुम्हीं बताओ राÓन वाले की मर्जी से चलना ठीक या अपनी मर्जी से?’’
यह जान कर पल्टू को अपने मालिक बुद्धिमान लगे। लेकिन फिर Òी Óायद उसे समझने में कोई कठिनाई हो रही थी, ‘‘मगर ई तोे चोरी अउर सीनाजोरी हुई न!’’
‘‘मैं अकेला तो नहीं हूँ। मुहल्ले वाले सÒी वहां से सामान लेते हैं।’’ वर्मा जी ने उसे समझाया।
...इस प्रकार Ìीरे-Ìीरे और न चाहते हुए Òी पल्टू Óहर की बातें सीखने लगा था। जब कÒी उसका सरल मन Óहर की बातों के विरुद्ध गुस्से से Òरने लगता, वह मन मार कर स्वयं को समझाने लगता, वो Óहर है। Óहर में यही सब चलता है! वहां की बातें देख-सुन उसके मन में बसी Óहर और Óहर के लोगों की सुंदर छवि, बुरी तरह खंडित हो रही थी। साफ-सुथरे Óहर से उसे अपना Ìूल-मिट्टी वाला गाँव ज्यादा Òला लगने लगा था। लेकिन इन सब के बावजूद वह अपने गाँव वापस लौटने के बारे कÒी न सोचता। Óहर की जकड़ में Ìीरे-Ìीरे, बेमन से ही सही, परन्तु रहना सीख रहा था।
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ऐसे ही एक सुबह उसे उठ कर दूÌ लाना सिखाया गया। Òुजंग से उसका परिचय पहले ही करवाया जा चुका था।
अगली सुबह दूÌ लेने पहुँचे पल्टू के कानों में Òुजंग का अपनत्व Òरा वाक्य फिर से गूँज गया। ‘‘का हो Òइया, Óहर में मन तो लग रहा है न!’’
Òुजंग का अपनापन और चम-चम करता खटाल देख वह प्रÒावित हुआ। वह चहक-चहक कर उससे बातें करने लगा। वहाँ की हर चीज उसकी उत्सुकता जगाने वाली थी। Òुजंग ने दूÌ दुहने से पहले Òैंस को सूई लगाई तो वह चौंका।
‘‘आपकी Òैंस बीमार है क्या?’’ उसने चिंता व्यक्त की।
‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं!’’
‘‘तब उसे सूई काहे लगाई?’’ चिंतित स्वर अब उत्सुक था।
‘‘सूई से दूÌ ज्यादा होता है।’’
कुछ विचारते हुए पल्टू ने अपना संदेह प्रकट किया, ‘‘...वैसा दूÌ ज+रुर कम ताकत वाला हो जाता होगा।’’
ßनहीं, बिल्कुल नहीं। सूई वाला दूÌ तो और ज्यादा ताकत वाला हो जाता है।’’ Òुजंग ने अपना व्यापारिक चतुराई Òरा ऐसा उत्तर दिया कि पल्टू को सहज ही विश्वास हो आया, ‘‘...और ज्यादा दूÌ का अर्थ है ज्यादा गzाहक। यानि ज्यादा मुनाफा समझे!’’ Òुजंग के Òीतर का कुटिल व्यापारी उत्साह से बताए जा रहा था।
‘‘जब तुम्हारे गzाहक ज्यादा हो जाएंगे, तब तुम क्या करोगे?’’ पल्टू ने Òोलेपन से पूछा, ‘‘तुम उन सबके लिए दूÌ कहाँ से लाओगे?’’
‘‘दूÌ लाना तो मेरे लिए बाँये हाथ का खेल है।’’ Òुजंग मुस्कुरा रहा था।
‘‘Òला वो कैसे?’’ फिर बोला, ‘‘मैं जान गया। तुम और जानवर ले आओगेे।’’
लेकिन Òुजंग के उत्तर ने उसे चक्कर में डाल दिया, ‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं!’’
‘‘तब कैसे करोगे? क्या तुम कोई जादू जानते हो?’’
‘‘Óहर में नये-नये आये हो, सब कुछ आज ही जान लेना चाहते हो क्या?’’ कहता Òुजंग दूÌ दुह रहे अपने चेले की ओर बढ़ गया। और उनके बीच उस दिन की बात चीत खत्म हो गई।
सुबह के कामों को निपटा खटाल पहुंचने तक उसे अक्सर देर हो जाती। फिर Òी उसे दूÌ सुरक्षित और पूरा मिलता। Òुजंग के साथ बहुत ज्यादा बातें नहीं हो पातीं, मगर वे दोनों काफी अपनेपन से मिलते। पल्टू और Òुजंग की प्रगाढ़ता खिलने लगी। परन्तु पहले दिन जहां बात खत्म हुई थी, पल्टू उसे नहीं Òूल पाया था। अब इसे संयोग कहें या दुर्योग, एक दिन वह समय से पहले खटाल पहुँच गया। दोनों प्रसन्नता से बातें करने लगे। जब उसे लगा Òुजंग उसकी बात न टालेगा, उसने दूÌ बढ़ाने वाली बात फिर छेड़ दी।
ßतुमने कहा था, बिना जानवरों को बढ़ाए ही दूÌ बढ़ा लोगे। Òला ऐसा कैसे करोगे?’’
Òुजंग उस दिन कुछ मौज में था। उसने चुनौती दे डाली, ‘‘बूझो तो जानूं।’’
कुछ देर सोचने का उपक्रम कर पल्टू ने हथियार डाल दिये, ‘‘मैं हार गया, अब तो बता दो। हमारे गाँव में तो ऐसा जादू कोई नहीं कर सकता।’’
अपने स्वर को रहस्यमय बनाता Òुजंग बोला, ‘‘ये राज किसी को न बताना।’’
ßहां, हां नहीं बोलूंगा।’’ पल्टू ने हामी Òरी।
ßज्यादा गzाहक होने पर पहले समस्या थी। अब मैं गzाहक बढ़ने से पहले ही उनके दूÌ की व्यवस्था कर लेता हूँ। यहां सब को मेरा ही दूÌ पसंद है। दूसरे ग्वालों से कोई दूÌ नहीं लेता। वे अपना सारा दूÌ मुझे, मेरी मन चाही कीमत पर बेच देते हैं। इस तरह मेरे पास दूÌ नहीं Äटता।’’ Òुजंग अपनी ही रौ में बोले जा रहा था। पल्टू के लिए सारी बातें किसी तिलिस्म से कम न थीं।
‘‘...जब गzाहक और बढ़ गये, तब मैंने दूÌ नापने वाले पौवे को नीचे से चपटा कर लिया।’’
‘‘Òला वो क्यों?’’
‘‘अरे बुद्धू, इस तरह कम दूÌ में ही पौवा Òर जाता है।’’ Òुजंग की बेफिक्री इस बात की गवाह थी कि उन जानकारियों के बावजूद पल्टू उसका अहित नहीं कर सकता, ‘‘...और अब तो मैं ऐसा उपाय खोज चुका हूँ जिससे मेरा दूÌ कÒी नहीं Äटेगा।’’
‘‘वो उपाय क्या है?’’ आश्चर्यचकित पल्टू को Òुजंग वाकई एक जादूगर लग रहा था।
‘‘अब मैं दूÌ में बस ज+रुरत Òर पानी मिला देता हूँ।...स्वच्छ जल, समझे! चलोे अब तुम Óांति से डोल चबूतरे पर रख लाईन लगा लो, फिर बोलोगे देर हो गई।’’ Òुजंग काम में लग गया।
पल्टू को मिली जानकारियाँ काफी आश्चर्यजनक थीं। ये सब बातें तो वर्मा साहब ने उसे नहीं बतार्इं। डोल रख वह एक तरफ खड़ा हो गया। लोग आते, अपना दूÌवाला बर्तन लाईन में रख गप्पों में मÓगूल हो जाते। सकुचाया सा पल्टू एक तरफ गुमसुम खड़ा दिख रहा था। लेकिन उसके Òीतर विचारों का तूफान उथल-पुथल मचा रहा था। दूÌ कम देने की बात तो खैर, न चाहते हुए Òी, वह समझ ले रहा था। लेकिन मिलावटी व अÓुद्ध दूÌ वाली बात उसकी समझ में नहीं उतर रही थी। वह कई-कई तर्कों से स्वयं को समझाने का प्रयत्न कर रहा था। परन्तु समझ कर Óांत हो जाने की जगह उसका अंतर और Òी ÌÌकने लगता। तब तक Òुजंग दूÌ की बाल्टी ले आया। साथ में पानी Òरा चमचमाता जग Òी। पल्टू के Òीतर का तूफान अपने चरम पर था।...दूÌ तो Óरीर बनाता है...खून बनाता है...आत्मा बनाता है! मिलावटी दूÌ से कैसा Óरीर...कैसा खून...कैसी आत्मा बनेगी...? उसका अंतर्मन उबल रहा था। उसने फिर से स्वयं को समझाना चाहा, वो Óहर है। Óहर में ऐसा ही Óरीर, ऐसा ही खून और ऐेसी ही आत्मा होती है, उसे परेÓान नहीं होना चाहिए। लेकिन न चाहने पर Òी उसका ध्यान वहीं जा अटकता। और जब Òुजंग दूÌ में पानी मिलाने लगा तो वह स्वयं को न रोक पाया, उसने बढ़ कर मजबूती से उसका हाथ पकड़ लिया।
‘‘तुम दूÌ में पानी नहीं मिला सकते!’’ उसके स्वर में दृढ़ता थी।
अब तक सीÌी-साÌी बातें कर रहे पल्टू के व्यवहार में अचानक आये उस परिवर्तन से Òुजंग बुरी तरह चौंका। इतने वर्Ôों में आज तक किसी ने उसका हाथ यूं नहीं पकड़ा था। इतने बड़े और पहुँच वाले व्यापारी का हाथ एक अदना-सा मूर्ख-गँवार, वह Òी उसके ही खटाल में पकड़ ले! परन्तु स्वयं पर Óीघz ही उसने नियंत्रण कर लिया। उसके होंठों पर उपहास करती मुस्कान तैरने लगी।
‘‘पानी मिला दूÌ सेहत के लिए अच्छा होता है।’’
पल्टू ने आस-पास नजरें दौड़ाईं, ‘‘क्या आप लोग यह मिलावटी दूÌ लेंगे?’’
‘‘हां लेंगे! हम तो यही दूÌ लेते हैं।’’ कुछ लोगों का ढीठाई से मुस्कराता उत्तर सुन उसे लगा, वह चकरा कर गिर जाएगा।
‘‘क्यों आज दूÌ को क्या हो गया?’’ एक हंसी पल्टू के कानों में ज+हर Äोल गई।
‘‘तुम्हें नहीं लेना तो साईड हटो।’’ दूसरे ने टहोका लगाया।
‘‘मैं साइड क्यों हटूँ? सबसे पहले मैं आया हूँ, दूÌ पहले मैं ही लूंगा।’’ तब तक वह उन लोगों की उदासीनता से उबर चुका था।
‘‘तो लो न मेरे बाप और हमें Òी लेने दो, आWफिस जाना है।’’ पीछे से एक गर्दन निकली।
‘‘...लेकिन मैं पानी वाला दूÌ नहीं लूँगा। मैं खाँटी दूÌ लूँगा।’’ पल्टू दृढ़ था।
‘‘क्यों Òई, चिड़ियाÄर से Òागे हो क्या?’’ एक और व्यंग-बाण उसकी ओर झपटा।
अब तक मजे से तमाÓा देख रहे Òुजंग ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘Óायद वहां किसी चिड़ियाÄर में ही रहता था। वर्मा जी अपने गाँव से लाये हैं।’’
पल्टू ने Òीड़ को ललकारा, ‘‘आप सब के सामने दूÌ में पानी मिलाया जा रहा है। परन्तु आप लोग इसे रोकने की जगह मुझे ही रोक रहे हैं!’’
‘‘तो क्या करें? तुम्हारी आरती उतारें या तुम्हारी तरह बेवजह का Óोर करने लगें?’’ एक और आवाज पल्टू की पीठ पर चाबुक सी पड़ी, ‘‘पानी मिलाने की सहमति देने के बाद हम ही उसे रोकेंगे क्या?’’
‘‘आप सब की सहमति!’’ वह बुरी तरह चौंका।
‘‘हां, पहले Òुजंग पहले छुप कर पानी मिलाता था। डर बना रहता था, कहीं तालाब या पोखर का पानी न मिला दे। सामने मिलाने से अब वह डर तो नहीं है।’’ आवाज वाला चाबुक फिर लहराया।
‘‘पल्टू महाराज, वास्तव में हम सब Òुजंग के Óुक्रगुजार हैं। वह सब कुछ बड़ी ईमानदारी से करता है। अगर वो बेईमानी करना चाहे तो, Ìोखे से हमें सिंथेटिक दूÌ बेच लाखों का वारा-न्यारा कर ले। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। जानते हो न सिंथेटिक दूÌ कितना हानिकारक होता है?’’ एक प्रश्न Òी साथ में उछल कर आया।
पल्टू के इंकार पर उपहास करती हंसी फिर उÒरी, ‘‘सिंथेटिक दूÌ नहीं जानते और चले हो हमें मिलावटी दूÌ की बात बताने!’’
‘‘लेकिन मुझे सब पता है।’’ Òुजंग ने मोर्चा संÒाला, ‘‘वह एक निश्चित अनुपात में तरल साबुन या डिटरजेंट, कास्टिक सोडा, खद~य तेल¼पामोेलिन½, यूरिया, पानी आदि के मिश्रण से बनाया जाता है जिसे बाद में क्रीम निकाले दू̼सपरेटा½ में मिला Óुद्ध दूÌ के Òावों पर बेचा जाता है। वह दूÌ बिना उबाले तकरीबन आठ Äंटे तक सुरक्षित रह सकता है। चाहो तो ऐसे दूÌ से Äी Òी तैयार कर लो। मज+े की बात तो यह कि समझदार से समझदार विÓेÔज्ञ Òी ऐसी मिलावट का पता नहीं लगा सकता। लेकिन मैं उसका व्यापार नहीं करता, क्योंकि वैसा दूÌ जीवन के लिए बड़ा हानिकारक है। वह ‘Ìीमे ज+हर’ की तरह काम करता है।’’ गर्दन ताने Òुजंग ऐसे बता रहा था, मानों वैसा न कर के उसने सब लोगों पर अहसान किया है। उसके Òारी-Òरकम तर्कों से दबा पल्टू स्वयं को बड़ा असहज और कमजोर महसूस कर रहा था। जिन लोगों को उसका समर्थन करना चाहिए था, वे ही उसके विरुद्ध Òुजंग के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। वह तो एक Òुजंग को रोकना चाहता था, वहाँ कई-कई Òुजंग सीना ताने खड़े हैं। उसका विश्वास पक्का होने लगा, उन लोगों का खून, Óरीर, आत्मा मिलावटी दूÌ से कमजोर हो चुके हैं। उसका निश्चय और मजबूत हो गया, वह किसी Òी हाल में मिलावटी दूÌ नहीं लेगा।
हाल में ही ‘मिनरल वाWटर’ की एजेंसी ले चुके एक सज्जन आगे बढ़ेे, ‘‘जल्द ही हम अपने लिए और ज्यादा सुरक्षित दूÌ लेने लगेंगे।Þ
ßवो कैसे?Þ
ßहम सब आम सहमति से दूÌ में ‘मिनरल वाWटर’ मिलाने वाले हैं।’’ आवाज वाली आँखों में संÒावित मुनाफा चमक रहा था।
वे सारी जानकारियां पल्टू को चकरा कर पटक देने के लिए काफी थीं, लेकिन उसने अपने होÓ काबू में रखे। वह चीखा, ‘‘एक तो मिलावटी दूÌ लेते हंै। दूसरे फरेबी Òुजंग को सच्चा साबित करने के लिए इसका पक्ष ले रहे हैं। अरे, दूÌ ही तो इस पृथ्वी पर सबसे सच्ची और पवित्र चीज है। जब वही अÓुद्ध हो गया तब बाकी क्या बचेगा? आप लोगों को Óर्म आनी चाहिए।’’
‘‘नहीं, हमें तो Óर्म नहीं आती।’’ पहली आवाज ने बेÓर्मी से कहा।
‘‘हमारी मर्जी जैसा चाहें दूÌ लें, तुम कौन होते हो हमें सिखाने वाले? हम तुम्हारे पैसों से तो नहीं ले रहे।’’ पल्टू को लगा उसकी चीख प्रतिध्वनि बन कर लौट आयी है।
‘‘अरे गोबर गणेÓ, तुम्हें दूÌ नहीं लेना तो हटो एक तरफ। हमें ले लेने दो पहले ही काफी देर हो चुकी है।’’ मिनरल वाWटर वाले सज्जन ने उसे Äुड़का।
अब तक पल्टू समझ चुका था, उसे अकेले ही मोर्चा लेना होगा, ‘‘नहीं, मैं नहीं हटूंगा। मैं पहले आया था, दूÌ पहले मैं ही लूँगा! मेरे बाद आप लोगों की मर्जी है, दूÌ में पानी मिलवाएं या ज+हर।’’
हालाँकि पल्टू अकेला था, लेकिन उसके स्वर की दृढ़ता सÒी आवाजों पर Òारी पड़ी थी। इस बवाल में देर होने से लोगों की कसमसाहट बढ़ रही थी। वे सब किसी Òी तरह मामला निपटा कर निकल जाना चाहते थे।
एक ने Òुजंग को समझाया, ‘‘अरे Òई, तुम ही मान जाओ। दे दो इसे खाँटी दूÌ।’’
Òुजंग बुरी तरह चौंका। उसकी हां में हां मिलाने वाले पल्टू के पक्ष में क्यों बोलने लगे? वह सावÌान हो गया। यह सिलसिला चल पड़ा तो आगे कठिनाई पैदा करेगा। इसे अÒी और यहीं खत्म करना होगा, ऐसा सोच वह Òी अड़ गया, ‘‘नहीं सर, हम तो सब को एक सी क्वालिटी का दूÌ देंगे। हमारा पूरा व्यापार क्वालिटी पर खड़ा है। एक गँवार के कहने से अपना क्वालिटी तो खराब नहीं करेंगे न।’’
लोग चुप थे, उन्हें Òुजंग का फैसला सही लगा। लेकिन हल निकलता न देख उनकी व्यगzता बढ़ती जा रही थी।
तÒी एक आदमी की समझ में Òुजंग की कठिनाई आयी। वह बोला, ‘‘ऐसा करो, इसे खाँटी दूÌ देने से तुम्हें जो नुकसान होगा, उसे हमारे दूÌ में ज्यादा पानी मिला कर मेकअप कर लो।’’
दूसरों ने Òी उस प्रस्ताव का समर्थन किया, ‘‘हां, हां ऐसा कर लो।’’
परन्तु Òुजंग जैसे व्यापारी ने तुरंत ही उस प्रस्ताव के दूरगामी प्रÒावों की गणना कर ली, ‘‘नहीं सर, ऐसा नहीं हो सकता। आज इसके कहने पर हम आपके दूÌ में ज्यादा पानी मिलाएंगे, कल किसी और को खाँटी दूÌ देने के लिए आपके दूÌ में और ज्यादा पानी मिलाएंगे। हम आपके दूÌ में कितना पानी मिलाएंगे? हमको आपके दूÌ की क्वालिटी की चिन्ता नहीं है क्या?’’ Òुजंग ने अपनी आवाज में मिश्री Äोलते हुए उस प्रस्ताव को रद~द कर दिया।
पल्टू के अलावा वहां मौजूद हर व्यक्ति बड़ा प्रÒावित हुआ, देखो Òुजंग को हमारी कितनी चिन्ता है। उन्हें एक बार फिर से पल्टू नागवार लगने लगा। Òुजंग का मनोवांछित हो गया। उसकी कुटिल चाल ने बाजी फिर से अपने हक+ में कर ली।
ßहां, हां Òुजंग बिल्कुल ठीक कह रहा है।’’ Òीड़ की आवाज उÒरी, ‘‘तुम मिलाओ दूÌ में जितना पानी मिलाना है, हम सब तुम्हारे साथ हैं।’’
Òीड़ की आवाज सुन पहले तो पल्टू बड़ा विचलित हुआ, फिर उसके स्वर में Òी कठोरता बढ़ गई। उसने कुटिलता से खिल आये Òुजंग के चेहरे पर आँखें गड़ाये कठोर स्वर में पूछा, ‘‘तुम मुझे दूÌ दोगे या नहीं?’’
जाल में फंसे कीड़े को देख जो Òाव मकड़े के चेहरे पर उÒरते हैं, ठीक वही Òाव Òुजंग के चेहरे पर थे, ‘‘दूंगा, ज+रुर दंूगा। लेकिन पानी मिलाने के बाद।’’ उसने अपने हाथ में थमा पानी Òरा जग दूÌ की बाल्टी में उलट दिया।...उसका दूÌ बिक्री योग्य हो गया था।
यह देख पल्टू हिस्टीरियाई अंदाज में चीखा, ‘‘यह दोगे मुझे?...यह अब दूÌ कहाँ रहा?’’ कहते हुए उसने जोरदार लात बाल्टी पर दे मारी। Ìड़ाम~...की आवाज से बाल्टी उलट गई।
जमीन पर फैलतेे दूÌ के साथ Òुजंग के चेहरे पर अपमान और हार की कालिमा साफ नजर आ रही थी। एक पल को वहां सन्नाटा छा गया। सÒी सकते में थे।
गुस्से में कांपता Òुजंग जोर-जोर से चीखने लगा, ‘‘जाने कैसे-कैसे गँवार नौकर आप लोग ले आते हैं। पहले ऐसे मूर्खों को Óहर के तौर-तरीके सिखाइए, तब मेरे पास Òेजिए।’’ फिर फर्Ó पर फैले दूÌ की ओर इÓारा करता बोला, ‘‘आप सब कान खोल कर सुन लीजिए यह नुकसान मेरा नहीं है। मैं यह दूÌ Òी आप सब के हिसाब में लिखूंगा।’’
वहां काम करने वाले एक लड़के ने पल्टू को पकड़ लिया। लेकिन वह कुछ करता उससे पहले ही पल्टू के जोरदार झटके ने उसे दूर फेंक दिया। कुछ लोग बीच-बचाव करने लगे।
‘‘देखो Òुजंग, मार-पीट करने से क्या फायदा?’’
‘‘वैसे Òी इस दूÌ के पैसे तुम हमारे खाते में चढ़ाने की बात कह चुके हो।’’
Òुजंग ने अपने लड़के को रोक लिया। पल्टू ने Òी वापसी की राह ली।
‘‘आज तो बिना चाय के ही आWफिस जाना पड़ेगा।’’
‘‘आज नींबू वाली चाय पी लेना।’’ दूसरे ने सुझाया।
एक आवाज Ìीमे से उÒरी, ‘‘देखा जाए तो पल्टू ठीक ही कह रहा था।’’
‘‘तो जाइए न आप Òी उसके साथ Äूम-Äूम कर लातें चलाइए। आपको रोका किसने है? हां इतना बता दीजिए, कहां-कहां लातें चलाइएगा?’’ पहली आवाज ने उन्हें ललकारा।
परन्तु उस ललकार का जवाब न आया। सब लोग खामोÓी से अपने गंतव्यों की ओर बढ़ गये।
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खटाल में Óांति छा गई। मगर Òुजंग को चैन न था। पास बैठा लड़का Òी कसमसा रहा था, ‘‘आपने मुझे रोक दिया, वर्ना मैं उस गँवार को न छोड़ता।’’
‘‘चेले, हम व्यापारी अगर लड़ने लगे, तब हुआ हमारा ÌंÌा!’’
‘‘अगर उसने कल Òी आकर ऐसा हंगामा किया तो?’’
‘‘हां, वही सोच रहा हूँ। ऐसा उपाय ढूंढना पड़ेगा जिससे साँप मर जाए और लाठी Òी न टूटे।’’ Òुजंग उठते हुए बोला, ‘‘मैं उसे कल यहां आने लायक नहीं छोड़ूंगा। तुम बाकी के काम देखो मैं जरा थानेदार के Äर से हो कर आया।’’
‘‘उनका दूÌ...।’’
‘‘नहीं, अÒी बिना दूÌ के जाÅंगा। तÒी बात बनेगी।’’ Òुजंग निकल गया।
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लगÒग उसी समय पल्टू अपराÌी बना वर्मा जी के सामने खड़ा था। मिसेज वर्मा दूÌ न आने से वे खासी परेÓान थीं।
‘‘मैं पूछता हूं, तुम्हें नेता बनने की क्या जरुरत थी?’’ वर्मा जी झल्लाये, ‘‘अब अगर Òुजंग ने हमें दूÌ देना बंद कर दिया तो? नहीं, नहीं कल से तुम दूÌ लेने नहीं जाओगेे।’’
पल्टू उनकी झल्लाहट ना समझ पाया। वह तो Óाबासी की उम्मीद कर रहा था। वहां खटाल में Òुजंग मौजूद था, इसीलिए लोग उसकी ÒाÔा बोल रहे थे। परन्तु यहां तो नहीं है, फिर Òी क्यों साहब उसी की ÒाÔा बोल रहे हैं? उसे लगा अपने दूÌ के जरिए Òुजंग साहब के Òीतर Äुस आया है। Óहर में सÒी Òुजंग के वÓ में हैं। क्या Óहर में रहने के लिए उसे Òी Òुजंग के वÓ में होना पड़ेगा? पल्टू जैसे-जैसे सोचता जाता, उसके अंतर में बसी Óहर की सुंदर छवि वैसे-वैसे ढहती जाती। उसे गाँव का कादो-कीचड़ Óहर की साफ-सुथरी सड़कों से ज्यादा अच्छा लग रहा था। Óहर की मृग मरीचिका से उसका मोह पूर्णत: Òंंग हो चुका था।
‘‘साहब, अब मुझे Óहर में नहीं रहना है। मुझे गाँव वापस Òेज दीजिए।’’
वर्मा दंपत्ति ठगे से रह गये। तुरंत ही उन्हें कई चिन्ताओं ने आ Äेरा। पल्टू ने Äर के कितने काम संÒाल लिए थे। वह वापस चला गया तो सारे काम फिर से उन्हीं के सर आ पड़ेंगे।
वे दोनों पल्टू को समझाने लगे, ‘‘अरे इतनी सी बात पर Äबरा गये। मैंने कहा न कल सेे दूÌ मैं ही लाया करुंगा। बिल्कुल मत Äबराओ, Ìीरे-Ìीरेे सब सीख जाओगे। यहां तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी, गाँव में क्या रखा है?’’
‘‘नहीं साहब, मैं यह सब नहीं सीखना चाहता। मैं आपके हाथ जोेड़ता हूं, मुझे जाने दीजिए।’’ पल्टू की आँखें नम थीं। उसकी हालत देख, वर्मा दंपत्ति निरुत्तर हो गये।
‘‘सुनो जी!’’ मिसेज वर्मा फुसफुसाई, ‘‘ये कोई और बखेड़ा न खड़ा कर दे। जाने दो इसे।’’
उस स्थिति में वर्मा जी को Òी उसकी बात जँची। अनुमति मिलते ही पल्टू जा कर सामान बाँÌने लगा। वह जल्द से जल्द Óहर छोेड़ देना चाहता था।
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Òुजंग को खाली हाथ आया देख थानेदारनी का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। मगर उसने जब रोनी सूरत से नमक-मिर्च लगा अपनी रामकहानी सुनाई, थानेदारनी का दिल पसीज गया। उसने बकायदा ‘Ýाई’ करके वह कहानी थानेदार को जा सुनाई ¼संइयाँ Òये कोतवाल..½।
‘‘कहाँ है Å गुंडा?’’ थानेदार की कड़कती आवाज पर दो सिपाही Òुजंग के साथ हो लिये।
बस अड~डे की ओर जाते पल्टू की गर्दन ‘Òुजंग एण्ड पार्टी’ ने रास्ते में ही जा पकड़ी।
सारा माजरा समझते ही पल्टू अपनी गर्दन छुड़ाने के लिए छटपटाने लगा, ‘‘छोड़ो मुझे! मुझे जाने दो! मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!’’
एकबारगी तो Òुजंग के जी में आया कि जाने दे बला अपने आप ही टल रही है। लेकिन तुरंत ही उसने अपने मन की बात काट दी। अब तो उसे मजा चखाना ही चाहिए। यूँ ही जाने देने में क्या मजा आएगा।
ßक्यों, तब तो बड़े Óेर बन रहे थे। अब Óहर की दीक्षा लिए बिना गाँव कैसे जाओगे?Þ
...और किसी को Òी पता न चला, गाँव जाता पल्टू Óहर की हवालात में पहँुच गया। वर्मा जी के मुताबिक पल्टू अपनेे गाँव चला गया है। पल्टू के बाप की जानकारी में वह Óहर में है। जबकि उसकी असल जगह का पता केवल Òुजंग और पल्टू को था। Òुजंग का व्यापार पूर्ववत~ चलने लगा। उस दिन की हल्की-फुल्की चर्चा के अलावा किसी ने Òी पल्टू के बारे में कुछ Òी जानने में रूचि न दिखाई। कायदे से तो यह कहानी यहीं समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन ठीक यही पर पेंचदार मोड़ आ जाने के कारण सब कुछ उल्टा-पुल्टा होने लगा। आप में से कुछ पाठक मुझ पर आरोप लगाएंगे कि मैं Òूत-प्रेत पर विश्वास करता हँू और उनके समर्थन में तर्क दे रहा हूँ। मगर विश्वास कीजिए ऐसा नहीं है।
पल्टू का उपाय कर निश्चिंतता से सोये Òुजंग को पहली बार जो वह सपना आया तो फिर लगातार ही हर रात आने लगा। Ìीरे-Ìीरे उन सपनांे की Òयानकता बढ़ती ही जा रही थी। इसी कारण Òुजंग ने पल्टू को हवालात से छुड़वाने का निश्चय किया।
उÌर हवालात में रोते पल्टू को Òी दूसरी रात एक सपना दिखा, ‘कि Òुजंग के खटाल में लाइन लगाए लोग हंस-हंस कर दूÌ ले रहे हैं। वर्मा जी Òी वहां हैं। पल्टू उन्हें वह दूÌ लेने से रोकता है। मगर वे नहीं मानते। तब पल्टू बाल्टी को लात मार कर गिराना चाहता है। लेकिन इस बार बाल्टी टस से मस नहीं होती। वहां खड़े लोग उस पर हंसते हैं। वह गुस्से में Òर कर बाल्टी पर पिल पड़ता है। परन्तु बाल्टी पर कोई असर नहीं होता। लातें चलाता पल्टू पसीने से सराबोर हो हांफने लगता है..।’ यहीं आ कर उसका सपना टूट गया। नींद खुलने पर वह बड़ी देर तक रोता रहा। और इस तरह इस कहानी का दूसरा सपना खत्म होता है।
अगली सुबह Òुजंग उसके सामने खड़ा था। Äृणा से पल्टू ने मुँह फेेरना चाहा, लेकिन उसकी बात सुन वह वैसा न कर सका।
‘‘क्या तुम सच में अपने गाँव जाना चाहते हो?’’ Òुजंग मुस्करा रहा था।
पल्टू को सहसा अपने कानों पर विश्वास न हुआ। वह तेजी से उठ कर खड़ा हो गया। उसकी आँखें में तीवz चमक थी। खुÓी से ‘हां’ में हिलती उसकी गर्दन में Òुजंग को अपनी जीत दिखाई पड़ रही थी। ...थोड़ी ही देर में Òुजंग उसेे गाँव जाने वाली बस पर चढ़ा खुÓी-खुÓी लौट रहा था।
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...और कÒी Òी सपना न देखने वाले वर्मा जी को पल्टू के Óहर से जाने की सत्रहवीं रात वह Òयानक सपना पहली बार दिखा। कहानी का तीसरा सपना बड़ा ही जीवंत था, बिल्कुल ‘लाइव टेलीकास्ट’ जैसा! इसीलिए वो वर्मा जी को इतना Òयानक लगा था। उस रात से वो सपना उन्हें लगातार डरा रहा है। सपने में उनके सर पर सवार पल्टू पागलों की तरह चीखने लगता है, ‘‘मैं तो आपकी लड़ाई लड़ा था। आप मेरा साथ देते तो मुझे कोई नहीं हरा सकता था, Òुजंग Òी नहीं। मुझे Òुजंग ने नहीं आपने हराया है!...आपने!!’’
तÒी पल्टू के Óरीर से टपक कर नीचे गिर रही पसीने की हर बूँद से एक नया पल्टू पैदा होने लगता हैं। पसीने की जितनी बूंदें उतने पल्टू। Ìीरे-Ìीरे वहां कई पल्टू खड़े हांे जाते हैं। वे सब मिल कर वर्मा जी को बुरी तरह झिंझोड़ने लगते हैं। उनकी बढ़ती Òीड़ से वर्मा जी का दम Äुटने लगता है। हर बार सपने का माहौल इतना अÌिक डरावना हो जाता है कि वे चीख मार कर उठ बैठते हैं।
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¼कमल½
संपर्क:- डी-1@1,मेÄदूत अपार्टमेंट~स, मरीन ड्राइव रोड, पो.-कदमा, जमÓेदपुर-831005 ¼झारखंड½ दूरÒाÔ:- ¼0657½ 2310149. 9431172954
