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Written on 3:29 AM by KAMAL


बाहर वाली कबzें
‘ये पुराने जमाने के राजा-महाराजा अपने किलों के मुख्य द्वार का रास्ता ऐसा टेढ़ा-मेढ़ा क्यों बनाते थे? आजकल तो प्रवेÓ के रास्ते कितने सुन्दर, चौड़े और सीÌे होते हैं।’‘इस एन्टरेंस, मेरा मतलब है, मुख्य द्वार पर इतने बड़े-बड़े लोहे के नुकीलेे कील क्यों लगे हैंे?’
ऐसे ही कई उत्सुक प्रश्न प्रतीक के लिए हैरानी का कारण बन रहे थे। मगर इससे पहले कि वह पूछे, उसका गाईड तत्परता से प्रश्नों का उत्तर दिये जा रहा था। मानों उसे पहले ही पता चल जाता हो, प्रतीक का अगला प्रश्न क्या होगा?
ßसाब जी, ये कोई साÌारण दरवाज्जा नहीं फत्ते ¼फतेह½ दरवाज्जा है। इससे हो कर आप जिस किले में Äुस रहे हैं सारी दुनिया उसे ‘कोहिनूर का Äर’ के नाम से जानती है। कोहिनूर हीरा जानते हैं न!Þ
ßहां Òई जानता हूँ। वही मनहूस हीरा न, जो जिसके Òी पास गया उसे बर्बाद कर गया ...।Þ प्रतीक बोला।
ßनक्को साबँ, हीरा कÒी मनहूस नहीं होता। वो Òी तो हमें पालने वाली इसी Ìरती के गर्Ò से निकलता है। बर्बाद होने वाले तो अपनी बुराइयों के कारण हुए थे या उन गरीब-आहों के कारण जिन पर उन्होंने अत्याचार किये थे।Þ गाईड ने बात बीच में ही काटते हुए कहा, ßखैर वह कहानी फिर कÒी, पहले आपके सवालों का जवाब। आपके दोनों ही सवालों का जवाब एक है- हाथी! हमलावरों के हाथी से बचने के लिए दरवाजे पर लोहे के नुकीले कील लगाए जाते थे। उस जमाने में जब कोई राजा आक्रमण करता तो उसे किले का मुख्य द्वार तोड़ कर ही Òीतर जाने का रास्ता बनाना पड़ता था। इस काम में हाथियों से आसानी होती थी। अब हाथी को जोर का Ìक्का लगाने के लिए तो दौड़ कर ही आना पड़ता न! हमले में हाथी दूर से सीÌा न दौड़ कर आ सके और द्वार ना टूटे जब्Òी रास्ता टेढ़ा और दरवाजे पर कील लगाए जाते थे। इस पूरे किले में नौ दरवाजे हैं और हर एक दरवाजा अलग-अलग नाम और खासियत रखता है।Þ
ßलेकिन इतनी सुरक्षा के बावजूद हमले तो तब Òी हुआ करते थे औैर किले वाले राजा हारते रहते थे।Þ गाईड के साथ चल रहे प्रतीक ने मानों उसे छेड़ा, ßतुम्हारे राजा लोग तो अक्सर ही आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। बात-बे-बात किसी का Òी सर कलम कर देते थे, हैे न?Þ
ßअब साब जी बड़ेे लोेगाँ की बाताँ तोे अलग ही होती हैं न! हां, उनकी लड़ाइयों के बारे में आप ठीक कह रहे हैं। लेकिन हमले और लड़ाइयां होती रहती थी, तÒी तो चीजें Òी बदलती रहीं वर्ना ये किला कÒी Òी पत्थरों का न बन पाता। सबसे पहले वारंगल के उस राजा ने इसे मिट~टी का ही बनवाया था। फिर जब कई सालों बाद सुल्तान ने अपनी स्वतंत्रता की ÄोÔणा की तब इसे मजबूत पक्की दीवारों वाले किले में तब्दील किया था।Þ
प्रतीक उसकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। वह पिछलेे तीन दिनों से उस Óहर में जापानी गार्डेन, हाइटेक सिटी, फिल्म सिटी, विकसित सागर तट जैसी आÌुनिक जगहों को देखता रहा था। लेकिन रहस्य-रोमाँच वाला वैसा आनंद केवल एक ही जगह मिल पाया था, जब वह पिछली Óाम निजाम के म्यूजियम में इटली के कलाकार जी.बी. बेन्जोनी की बनाई संगमरमर की प्रसिद्ध कलाकृति ‘वेल्ड रेबेका’ देख रहा था। आश्चर्यजनक किन्तु सत्य होने की सीमा को स्पर्श करती खूबसूरत कलाकृति! जिसका आधा चेहरा ÄँूÄट में था। लगता था मानों सांचे में ढले बदन वाली सुंदरी अÒी मुस्करा देगी। उसे देखते हुए प्रतीक की Ìमनियों में रक्त प्रवाह अचानक ही तेज हो गया था। वैसी ही रोमाँचक अनुÒूति उसे अब वहां सदियों पुराने किले मेें मिल रही थी। हमारा अतीत कितना Òव्य था और सुंदर Òी। मुख्य द्वार से Äुसते ही Òीतर की छत बहुत Åँची हो गई, बिल्कुल गुंबदनुमा।
गाईड ने उसे रोेकते हुए कहा, ß आजकल तो फोन, पेजर और मोबाइल न जाने क्या-क्या आ गये हैं। जब ये सब नहीं था साब जी, तब उन लोगां का काम कैसे चलता था, देेखिए।Þ कहते हुए उसने एक खास अंदाज में ताली बजाई। ताली की आवाज दूर तक गूँजती चली गई, ßदेखा, ऐसी ही ताली से यहां वाला पहरेदार Òीतर के पहरेदारों को सावÌान किया करता था।Þ
प्रतीक ने Òी वैसी ताली बजाने का प्रयत्न किया, लेकिन यह देख कर हैरान रह गया कि वैसी गूँज वाली ताली एक खास जगह पर खड़े होने सेे ही बज रही है।
बांयी तरफ वाले रास्ते से हो कर वे लोग किले के खुले Òाग में आ गये जिसके तीन तरफ इमारतें बनी थीं। इस बार ताली का वैसा ही कारनामा गाईड ने जब खुले में कर दिखाया तो वह चौंका। मुख्य द्वार पर तो माना Åँचे गुंबज के कारण ताली की आवाज गूँजी थी मगर वैसी ही गूँज अब खुले में सुन कर उसका आश्चर्य बढ़ गया।
ßवो सामने बेगम महल है। यहां खड़े पहरेदार ताली बजा कर बेगम-महल की औरतों को सावÌान करते थे कि कोई बाहरी आ रहा है, वे परदा कर लें। उÌर उस तरफ बेगम साहिबा रहा करती थीं।Þ बांयी तरफ लंबा-सा हाWलनुमा कक्ष दिखाते हुए वह बोला, ßइसमें किले के सारे हथियार और असलाह गोला-बारूद वगैरह रखा जाता था।Þ
पुराने से उस किले में जैसे-जैसे प्रतीक अंदर Äुस रहा था, इतिहास अपनी विÒिन्न Óक्लों और ढेर सारे रंगों में उनके सामने किसी तिलिस्म की तरह खुलता जा रहा था।
गाईड अपने नाWन-स्टाप खास अंदाज में लगातार बोल रहा था, ßउस जमाने में तो बिजली बत्ती नहीं थी। Óाम ढले कमरों को रौÓन करने का Òी उनका अपना खास प्रबंÌ था। इन दीवारों में बने ताखों को ध्यान से देखिए, यहां एक Óम्मादान रौÓन किया जाता था और बाकी जगहों में खास कोणों पर रखे ÓीÓों द्वारा एक ही Óम्मा से पूरा कमरा रौÓन हो जाया करता। ...देख लीजिए ध्वनि के साथ-साथ वे लोग प्रकाÓ के परावर्तन सिद्धांत से Òी बाखूबी वाकिफ थे।Þ
उस जगह से निकल वे एक बड़े से हाWल में आ पहँुचे। आस-पास खड़े ढेर सारे खंÒे और सामने की तरफ नीची छत के साथ-साथ काफी आगे तक निकल आयी बालकोनी-सी बनी थी।
गाईड उस जगह रुक कर बालकोनी की तरफ इÓारा करते हुए बोला, ßवहां Åपर बैठ कर बादÓाह हुजूर आने-जाने वाले लोगों से मुखातिब हुआ करते थे। मुजरिम को सजा Òी यहीं सुनाई जाती थी। इस जगह की खास बात यह है कि यहां खड़ा व्यक्ति वहां Åपर बैठे बादÓाह या बेगम का चेहरा नहीं देख सकता था। जबकि वहां से बादÓाह न सिर्फ उसे अच्छी तरह देख सकते थे, बल्कि उसकी हर हरकत पर आसानी से नजर Òी रख सकते थे। यहां खड़े व्यक्ति की जरा Òी हरकत का पता तुरंत चल जाता था। ये देखिए...Þ कहते हुए उसने अपनी कमीज को नीचे से पकड़ कर सामने की ओर खींचा और दूसरे हाथ की तर्जनी अंगुली से उस खिंचे कपड़े पर चोट की। कपड़े पर की गई वो मामूली-सी चोट वहां किसी बम की तरह गूंज गई, ßदेखा! यहां खड़े Óख्स की किसी Òी हरकत या संÒावित हमले से बादÓाह पूरी तरह महफूज था।Þ
सामने संकरी सीढ़ियां खुले में Åपर पहाड़ी-नुमा टीले की ओर जा रही थीं।
ßवहां Åपर दरबार-ए-आम था, साब जी! Óाही लोगाँ इन्हीं सीढ़ियों से Åपर जाते थे।Þ गाईड बता रहा था।
दिन Òर में ये लोग कितना बोल लेते होंगे। प्रतीक ने अनुमान लगाना चाहा था, ßतुम बोलते बहुत ज्यादा हो, थकते नहीं?Þ
ßसाब जी, हम ज्यादा बोलेंगा नईं, तो खाएंगा कैसे?Þ
अब तक वे लगÒग आÌी चढ़ाई तय कर चुके थे।
ßयह चढ़ाई बहुत तीखी है। वे राजसी लोग कैसे चढ़ पाते थे? मैं तो इतनी दूर आने में ही थक गया।Þ किनारे के एक बड़े पत्थर का सहारा लेता वह रुका, ß...Óायद इसलिए कि वे लोग Óाही खाना खाते थे। मेरी तरह केवल फास्ट फूड नहीं।Þ
ßनक्को साब जी वे लोगाँ पैदल नहीं चढ़ते थे। पालकी में बैठ कर Åपर जाते थे। उनकी पालकी ढोने वालों का चुनाव बड़ी सावÌानी से किया जाता। चढ़ाई वाली तरफ छोटे कद के और दूसरी तरफ Åँचे कद वाले आदमी होते थे ताकि पालकी एक सीÌ में रह कर Åपर चढ़े।Þ
पालकी ढोने वालों को अलग कद का होना चाहिए, इस बात की तरफ तो प्रतीक का ध्यान ही नहीं गया था। वाकई वे लोग काफी समझदार थे।
गर्मी और पसीने की चिचिपाहट में Åपर पहुँचते ही जिस पहली चीज ने उसका स्वागत किया वो थे, ठंढी हवा के झोंके। उन झोंकों की Óीतलता ने उस पर नÓे का सा सुहावना असर किया।
तÒी वहाँ खड़े एक पर्यटक की आवाज उसे सुनाई दी, ßअरे वाह, क्या नजारा है। लग रहा है जैसे सारा Óहर मेरे कदमों तले है।Þ
प्रतीक ने जब चारों तरफ नजरें फैलाईं तो एक तरफ दूर तक फैला, अब का आÌुनिक और विÓाल Óहर तथा दूसरी तरफ दूर तक फैली खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों की मंत्रमुग्Ì करती सुंदरता उसके सामने इठला रही थी। उसने पुन: पलट कर उस पर्यटक को देखा, ऐसे सुंदर, कलात्मक और नर्माे-नाजुक दृश्य से इसके Òीतर कैसे सामंतवादी विचार आ रहे हैं? ज+रूर वह मानसिक रूप से बीमार है।
प्रतीक के लिए तो आस-पास की पूरी दुनियाँ बदल कर खूबसूरत हो गई थी। Åंची-Åंची इमारतों, चौड़ी सड़कों, खुले समंदरी किनारों वाला दूर तक फैला Óहर उसकी आंखों के रास्ते उतरकर रता-रता उसके दिल में समा रहा था। वह दृश्य उसके लिए अÒूतपूर्व था। वैसा दृश्य Óहर की ÒागमÒाग में कहां मिलता है? उसके दिल में यही ख्याल आ रहा था कि काÓ वक्त थम जाए और जब तक वह चाहे, थमा रहे। लेकिन इतने खूबसूरत केवल ख्वाब हुआ करते हैं! वह Òी तो उसका एक ख्वाब ही था न!
हम लोग कितनी Òी क्रित्रिम सुंदरता, ठंढक देने वाले ए.सी. या तेज रौÓनी वाली व्यवस्था कर लें, परन्तु हवा का एक ठंढा झोंका, प्राकृतिक सुंदरता का एक जल्वा और सूर्य की रोÓनी हमेÓा ही इन सब क्रित्रिमताओं पर Òारी पड़ जाते हैं। प्रतीक एक तरफ ठंढी Äनी छांव में कमर सीÌी करने के लिए लेट गया। Óायद गाईड के लिए वह बात नई न थी इसलिए वह Òी एक तरफ बैठ कर सुस्ताने लगा। गर्मी और थकान से चूर प्रतीक पर Óीतल हवा के झोंके कुछ ज्यादा ही मेहरबान थे। उस पर खुमारी छाने लगी। ÓीÄz ही वह गहरी नींद के सपनों में खोता चला गया था।
सपने में जब उसकी आंख खुली तो अंÌेरा काफी Äिर चुका था। आंख खुलने पर एक पल को वह समझ ही नहीं पाया कि कहां पड़ा है। कुछ चेतन्य हुआ तो हड़बड़ा कर उठ बैठा। उस पुराने किले के दरबार की दीवारें उसे अचानक ही Òयावह लगने लगीं। कलाई Äड़ी की रेडियम लाइट रात के नौ बजा रही थी। सबसे पहले उसे रोहित का ख्याल आया। ओफ~...होटल के कमरे में लौेट कर वह परेÓान हो रहा होगा। हम दोनों को वापस वहां Óाम सात बजे तक पहुँच जाना था।
वे दोनों विगत तीन दिनों से बिजनेस के सिलसिले में उस Óहर आये हुए थे। आज दोपहर तक उनके सारे काम निपट चुके थे। कल सुबह की ट्रेन से उन्हे वापस लौट जाना है। केवल उनका बिजनेस ही एक था, बाकी रूचियां Òिन्न। इसीलिए तो रोहित फिल्म देखने निकल गया था। प्रतीक ने उसे किला देखने के लिए कहा और बताया कि वहां पर विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा मिला था। इसलिए वह Òी फिल्म का प्रोगzाम छोड़ कर उसके साथ चले, ऐसा मौका बार-बार नहीं आता। लेकिन रोहित के उत्तर ने उसे निराÓ किया था।
ßतब तो आज एक कोहिनूर तुम Òी ले आना। मगर साWरी डियर, मुझे तो वहां पुराने बेढंगे पत्थरों और Åट-पटांग अतीत के सिवा कुछ नहीं मिलेगा। और हाँ, जरा बच के रहना इन पुराने किलों, कबzों में बड़ी सुन्दर प्रेतनियां होती हैं। कहीं किसी ऐतिहासिक Óहजादी के प्रेम-जाल में न फँस जाना।Þ
वह गुनगुनाता हुआ फिल्म देखने निकल गया था। उन दोनों के बीच यह तय रहा कि डिनर के लिए रात आठ बजे से पहले होटल लौट आना है।
उसे अपने आस-पास कोई Òी न दिखा। गाईड Òी न था। वह उसे नींद में छोड़ कर अपने पैसे लिए बिना ही क्यों चला गया? गाईड ने उसे उठाया क्यों नहीं? वह गाईड पर खीझता-झल्लाता उठ कर नीचे की सीढ़ियोें की ओर लपका, जो दरबार के आंगन-नुमा ख्ुाले हिस्से में उतरती थीं। वहां से पत्थरों की चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियां किले के मुख्य द्वार की ओर उतर जाती हैं, जिसे गाईड ने फतेह दरवाजा बतलाया था। चारों ओर डरावना अंÌेरा था। वह स्वयं पर झुंझलाने लगा कि थकान और गर्मी से राहत पाने के लिए ठंढी हवा में क्यों लेटा था? दरअसल कड़ी धूप और झुलसाती गर्मी में दो-तीन किलोमीटर में फैले उस किले के सबसे Åपर स्थित राज-दरबार में वह जब पहुंचा तो ठंढी हवाओं ने उसमें आलस्य Òर दिया था। वर्ना ऐसी गड़बड़ कÒी ना होती।
आंगन-नुमा खुले तक तोे वह ठीक-ठाक उतर गया। मगर उसके आगे का रास्ता वह Òटक गया। बड़े-बड़े पत्थरों और Åँची-Åँची झाड़ियों के बीच रात के अंÌेरे में उसे नीचे जाने वाली सीढ़ियां नहीं मिली रही थीं। अलबत्ता नीचे जाने का रास्ता ढूंढते-ढूंढते न जाने कब वह उस खतरनाक किनारे तक आ पहुंचा था।
ßनक्को साब जी! उधर से नहीं, इधर से जाने का न!Þ ऐन मौके पर प्रतीक के कानों में वह तीखा वाक्य पड़ा।
उसे लगा पीछे से किसी ने उसका कंधा पकड़ लिया हो। न सिर्फ कंÌों पर उसका स्पर्Ó, बल्कि प्रतीक को संबोधित करने वाली आवाज+ Òी बड़ी सर्द थी। उसने मुड़ कर देखा तो मद्यिम चांदनी में जो Óख्स कुछ दूर खड़ा दिखा, उसकी वेÓ-ÒूÔा चौंकाने वाली थी। Óरीर पर सैनिक की वर्दी, कमर पर लटकती तलवार, पीठ पर ढाल। उसे लगा मानों पिछली Óाम देखे निजाम के म्यूजियम से कोई सैनिक निकल आया हो। कोई और स्थिति होती तो वह ठहाका मार कर हंस पड़ता, लेकिन अÒी तो वह स्वयं ही कठिनाई में था। उसने सोचा Óायद वहां का नाइट गार्ड हो। वह उसकी बताई दिÓा में मुड़ गया। इस क्रम में पैर की ठोकर से एक पत्थर लग कर फिसलते हुए नीचे गहरी खाई में जा गिरा। उफ~फ ...अगर इसने वक्+त पर पहुंच कर मुझे रोका ना होता तो मेरा Òी यही हश्र होना था, सोच कर एक ÒयÒीत सिहरन प्रतीक की रीढ़ में दौड़ती चली गई।
ßथैंक्यू...थैंक्यू वेरी मच!Þ उसने कृतज्ञता प्रकट की।
अंधकार में डूबे किले में उसके लिए वह किसी देवदूत की तरह प्रकट हुआ था। तेज+ बहती ठंढी हवाओं ने उसे अपने होनेे का पुन: अहसास कराया। इन्हीं ठंढी हवाओं ने तो उसकी नींद तोड़ी थी वर्ना न जाने कब तक सोया रहता।
ßतुम कौन हो? अचानक कहां से आ गये? मैं तो बड़ी देर से मदद के लिए किसी को तलाÓ रहा था।Þ प्रतीक ने अटकतेे-अटकते पूछा।
ßमैें तो Òोत पैले से ही आप को देख रहा था। मैंने सोेचा आप किल्ला देखने आये हो। मैं अब्Òी Òी नहीं आता साब। मगर आप तो खाई मेें ही जा पड़ने को थे।Þ उसने जवाब दिया।
ßहां, किला ही देखनेे आया था। लेकिन Óांतिदायी और ऐसे दिलकÓ माहौल ने सब कुछ Òूला दिया। जरा-सा क्या लेटा, आंख ही लग गई।Þ
ßचलिए मैं आप को किल्ला दिखाता हूं।Þ उसकी आवाज कुछ अजीब ढंग से गूँज रही थी।
ßनहीं, नहीं। अब तो तुम मुझे बाहर जाने का रास्ता बता दो बस।Þ
ßचलिए तो, रास्ता Òी बता दूंगा।Þ वह आगे-आगे चलने लगा, ßवो राजाओें-बादÓाहों का जमाना था। बादÓाह, राजा जानते हैं न!Þ फिर बिना जवाब सुने ही उसने बोलना जारी रखा, ßबादÓाहों का असली मतलब क्या होता हैे, आज के समय में आप ठीक से नहीं जान सकते। आज-कल वे नहीं होते न इसीलिए। लेकिन उस जमाने की तो बात ही कुछ और थी। बादÓाह जो Òी चाहता, जो Òी कहता वही होता था। न उससे सूत Òर इधर न सूत Òर उÌर, समझे साब जी। इसी जगह पर उनका दरबार लगा करता था। बादÓाह औेर बेगम की सवारियां पालकी में Åपर आतीं। अÒी हम लोेग जिस रास्तेे से नीचे उतर रहे हैं, वो आम लोगों के आने-जाने का रास्ता था।Þ
ßयहां से बेगम-महल का नजारा बड़ा हसीन दिखता है, दिन में चढ़ते समय मैंने देखा था।Þ प्रतीक ने उसे टोका।
वह धीमे से हंसा, ßखुÓ किस्मत हो जो इस जमाने में हो। वो जमाना होता तो उÌर देख लेने Òर की गुस्ताखी के कारण तुम्हारा सर कलम हो चुका होता। Åपर आते लोगों को हमेÓा सीढ़ियों पर नज+रें गड़ा कर चलने का हुक्म था। नज+र उधर गई कि गर्दन धड़ से अलग। यही Óाही हुक्म था। एक बार ऐसे ही Óाही हुक्म की तामील में एक गुस्ताख की गर्दन Ìड़ से अलग करने वाले सैनिक की तलवार से खुÓ हो कर बादÓाह नेे उसे खासतौर से Óहजादी की हिफाजत में लगा दिया था। Óहजादी बड़ी हसीन थी, ख्वाब सी खूबसूरत। रंग-रूप ऐसा कि उसके सामने चांदनी Òी फीकी पड़ जाए, आवाज ऐेसी कि कोयल Òी उसके सामने बोलते Óर्माए। वह जिÌर से निकल जाती मानों उÌर फूल ही फूल खिल उठते, खुÓबुएं बिखरने लगतीं, रोÓनियों मेंे इंदzÌनुÔी रंग Äुल जाते...।Þ
ßतुम तो ऐसे बोल रहे हो, जैसे वह सब तुमने Òी देेखा हो!Þ प्रतीक ने उसे टोका। उसे अब उसकी बातों में मजा आने लगा था।
ßरोÓनी देखने के बाद सूरज को देखना जरूरी तो नहीं साब। फिर मैं तो अदना-सा मुलाजिम हूँ, मेरी क्या औकात कि मैं Óहजादी को देखूं। लेकिन सब कहते हैं वो Óहजादी सूरत ही नहीं सीरत की Òी हसीन थी। तÒी तो उसकी दासियां और वह हिफाजती सैनिक, सÒी उसका पूरा ख्याल रखते, उसे हमेÓा खुÓ रखते। उसकी खुÓी से बादÓाह और बेगम Òी खुÓ रहते। मगर किसे पता था, सबकी वह खुÓी जल्द ही छिन जाएगी! ठीक ही कहा जाता है, अच्छे लोगों को अल्लाह जल्दी बुला लेता है। एक बार की बात है, वह ऐसी बीमार पड़ी कि हकीम, वैद सब बेकार हो गये। न कोई Òी दवा काम आयी न दुआ और देखते ही देखते Óहजादी अल्लाह को प्यारी हो गई।Þ बोलते-बोलतेे वह अचानक ही चुप हो गया था, मानों कुछ याद कर रहा हो।
ßफिर, फिर क्या हुआ?Þ
ßबस उसके बाद ही तो ठीक नहीं हुआ। जाने क्यों बादÓाह को लगा कि Óहजादी को मरने के बाद Òी देख-Òाल की जरूरत पड़ेगी। जिन्दा Óहजादी की सेवा और हिफाजत की बात तो ठीक है लेकिन Òला मुर्दे को सेवा और हिफाजत की क्या ज+रुरत? लेकिन बादÓाह ने हुक्म दिया कि Óहजादी की देखÒाल करने वाले हर Óख्स को मार कर उसकी कबz के आस-पास दफना दिया जाए। बादशाह का वह हुक्म उन सÒी मुलाजिमों के लिए कहर था जो Óहजादी की देख-Òाल में लगे रहते थे। मगर वे सब खामोÓ थे, किसी के Òी विरोÌ करने का कोई प्रश्न न था। Òला बादशाह की मुखालफत कोई कैसे करता? कुछ Òले वजीरों ने समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन बादशाह नहीं माना। अंतत: उसनेे शहजादी की देखÒाल और हिफाजत करने वाले दास-दासियों और उस सैनिक, सब को मरवा डाला। और उन्हें Òी शहजादी केे मकबरे के आस-पास दफना दिया।Þ
ßक्या?Þ प्रतीक अवाक~ रह गया।
ßजानते हैं साब जी, उस सैनिक की गर्Òवती पत्नी तब पूरे दिनों से थी। जिस दिन उसेे कत्ल किया गया, उसी दिन वह एक सुंदर बेटे का बाप बना था। माँ की गोद में आने के बाद बच्चा जिस चीज को सबसे पहले तलाÓता है, वह बाप ही तो होता है। पत्नी Òी पति की गोद में बच्चे को डाल कर दुनियां का सबसे बड़ा सुख पाती है। लेकिन उस सैनिक के साथ वैसा ना हो पाया। सिर्फ इसलिए न कि बादÓाह की इच्छा न थी। और फिर कुछ दिनों बाद जब पत्नी बेटे को बाप की कबz पर ले कर आयी तो माथा नवा कर उठा न सकी उस दिन पति की जुदायी का गम बेटे के मोह से ज्यादा हो गया था...बेटा हमेशा हमेशा के लिए अकेला हो कर रह गया था।
एक दासी तो अपनी अंÌी माँ का एकमात्र सहारा थी। उसका बाप और इकलौता Òाई पहले ही बादÓाह के लिए लड़ी एक लड़ाई में मारे गये थे। दासी की माँ पहले से अंÌी न थी, अपने पति और बेटे के गम में रोती आँखें अपना नूर खो बैठी थीं। वह तो बेटी की देख-Òाल ने उसे तब तक बचाए रखा था। जरा सोचिए साब, दासी की मौत के बाद उसकी माँ का क्या हाल हुआ होगा? उन सÒी लोगों की लगÒग एक जैसी ही कहानियाँ थीं, जो Óहजादी के साथ दफनाने के लिए मार डाले गये। लेकिन उन आम लोगों की क्या बिसात थी कि वे विरोÌ करते। ऐसी होती थी तब के राजाओं की इच्छाएं! शहजादी की देख-Òाल करने वालों की कबzें पहले बनायी गईं थीं, मरे तो वे बाद में थे।Þ
ßओे गाWड, हाÅ बzुटल!’ प्रतीक ने बेचैन सांस ली, ßकितने बर्बर थे पहले के शासक, बिल्कुल जानवर! एक मरी शहजादी के लिए कितने निरपराÌ लोगों को बेवजह मरवा डाला।Þ
न जानेे उसकी बात सैनिक वेश-धारी को क्यों बुरी लगी, उसका स्वर कुछ तल्ख होे गया, ßअच्छा साब जी आप लोगाँ तो सभ्य बन गये ना! अब तो आप लोगाँ को वैसे नहीं मारा जाता!Þ
ßहां, अब कोेई वैसी बर्बरता नहीं कर सकता है। अब न वैसे बादशाह होते हैं न उनकी वैसी बर्बर इच्छाएं।Þ उसने जवाब दिया।
ßतो फिर कÒी जात-पात के नाम पर, कÒी मंदिर-मस्जिद के नाम पर कÒी पानी तो कÒी तेल के नाम पर आप सभ्य लोगाँ किसकी इच्छा से मरते रहते हो?Þ उसके स्वर में व्यंग था, ßना साब जी, जो कबzें सदियों पहले यहां बाहर बनी थीं, तुम्हारी आज वाली कबzें Òी उन्हीं की अगली कड़ियाँ हैं। हां, एक फर्क ज+रूर है। तब विरोÌ ना करने वालों की कबzें बनती थीं, अब विरोÌ करने वालों की कबzें बनती हैं। इसके सिवा जरा Òी तो फर्क नहीं है इन दो अलग-अलग कालों में बनी कबzों में। बताइए न साब जी, कÒी देशों के बंटवारेे तो कÒी आत्मÄाती विस्फोेट। कहीं अयोध्या, तो कहीं गोÌरा-गुजरात, फिलिस्तीन, गाजा, सर्बिया और अफगानिस्तान कहां नहीं हैं वैेसी कबzें ?Þ
प्रतीक खामोÓ रह गया। पुराने सैनिक की वेश-ÒूÔा वाले से ऐसे किसी हमले के लिए वह कतई तैयार न था।
ßचलो माना कि तब बादशाह होेते थे, उनका हुक्म जैसे खुदा का फर्मान। अब तो बादशाह नहीं होेतेे, फिर क्यों सरयू का पानी और गुजरात की Ìरती का रंग बेगुनाहों के खून से लाल कर दिया जाता है? क्यों एक आदमी के इशारे पर ईराक के रेगिस्तान में सैेंकड़ों कबzें बना दी जाती हैं? छोड़ो साब, क्यों अपनी जम्हूरियत का झूठा दम Òरते हो? जम्हूरियत कÒी Òी जम्हूरियत का कत्ल नहीं करती। अगर सच में ही जम्हूरियत है, तब क्यों नहीं रुकता कबzोंे केे बननेे का यह Òयानक सिलसिला? बोेलोे साब जी...बोलो ना...। कबzें तो केवल अपनी मौत मरने वालों के लिए बननी चाहिए न! कबzें बनानेे केे लिए तो लोगोें को मत मारो!!Þ
उसकी आवाज से दर्द निकल कर प्रतीक की Ìमनियों में Äुसता जा रहा था। वह असहज महसूस करने लगा, ßयार, तुम तोे मेरे पीछे ही पड़ गये। तुम्हें क्या लगता है, इन सब के लिए मैं जिम्मेदार हूं? मैेंने तुम्हेें रास्ता बताने केे लिए क्या कह दिया तुम तो पूरा लेक्चर ही पिलाने पर तुल गये। Òला तुम मुझे ये सब क्यों बता रहे हो? मैं क्या करुंगा यह सब जान कर?Þ
ßमाफ करना साब जी, मुझे आप औरों से कुछ अलग लगे थे। सब सैलानी तो मकबरों के Òीतर वाली कबzों के बारे में ही पूछते हैं। आप जैसे लोग अक्सर नहीं आते, जो बाहर Ìूप, आंÌी, पानी में बनी उन मामूली कबzों के बारे पूछते हों। मैं जब Òी आप जैसे किसी इंसान को देखता हूं तो अपना दर्द नहीं संÒाल पाता। बस जी में एक ही बात आती है कि कोई दूसरा वो दर्द न झेेले जैसा दर्द तब हम लोगों नेे झेला था। माफ करें हुजूर, मैें तो केेवल आपकोे Óाही मकबरों के Òीतर की कबzों और बाहर खुले आकाÓ तले बनी मामूली कबzों का फर्क+ बताने आया था और न जाने क्या-क्या ले बैठा। दरअसल मेरी कबz के पास से गुजरते हुए दिन मेें आपने पूछा था न कि ये कबzें बाहर क्यों हैं? मगर आपका गाईड आपको ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे सका था। आप उसके उत्तर से असंतुष्ट रह गये थे।Þ
उसकी बात सुन कर प्रतीक बुरी तरह चौंका, ßक्या कहा तुमने? तुम्हारी कबz के पास ...? कौेन हो तुम? यहां के गार्ड नहीं हो क्या?Þ डर का तीवz अहसास उसकी रीढ़ से होता हुआ उसके पूरे बदन में फैलने लगा था।
ßहां साब जी, मैं उसी कबz का सैेनिक हूं। अब्Òी आपने मेरे को बरोबर पहचाना। बादशाह और शहजादी का वही चहेेता सैेनिक।Þ अब उसकी आवाज डरावनी लग रही थी।
ßक्या...? तुम उस कबz से निकल कर आये होे?Þ प्रतीक का चेेहरा Òय से पीला पड़ गया।
ßहां!Þ उसनेे जवाब दिया।
ßओ गाWड! तब से मैें एक Òूत सेे बातें कर रहा था। Ò...Ò...Òूत...Òूत!...बचाओ...बचाओ!Þ चीखते हुए वह मुड़ा और तेजी से सीढ़ियों पर नीचे की ओर दौड़ने लगा।
ßनक्को साब जी, ऐेसेेे नहीं आराम से जानेे का। चोेेट लग जाएगी।Þ वह सैेनिक पीछेेे से चिल्लाया, ßमेेरे से आपको डरने का नहीं। मैं आपको कोेई नुकसान नहीं पहुंचाने को। ऐसे मत दौड़ो, गिर जाओगे...।Þ
लेेकिन प्रतीक को अब उसकी बातेंे सुनने का होश कहां था। ÒयÒीत औेर बदहवास वह तेेजी से नीचे उतरता जा रहा था। अÒी वह कठिनाई से दस कदम ही दौड़ा होगा कि उसके कदम लड़खड़ा गये और वह फिसल कर सीड़ियों पर गिर पड़ा...। उसका Óरीर तेजी से सीढ़ियों पर नीचे की ओर लुढ़कने लगा।
ßउठिये, उठिये साब जी! और कितना सोयेंगे? अÒी नीचे Òी उतरना है। थोड़ी देर में ‘लाइट एण्ड साÅंड’ Óो का समय हो जाएगा।Þ गाइड ने जब उसका कंÌा थपथपाया, वह नींद में बड़बड़ा रहा था।
आंख खुलते ही सपने वाली रात और बाहर वाली कबzों के सैनिक का तिलिस्म टूट चुका था। उसने कलाई-Äड़ी पर नजर डाली। दस मिनट! केवल दस मिनट के ही ख्वाब में इतना कुछ? हां शायद, ख्वाब ही था। उसने गर्दन को जोर से झटका। लेकिन ख्वाब इतना सच क्यों लग रहा है?
प्रतीक ने अपना सर इÌर-उÌर Äुमा कर सपने वाले सैनिक को ढूंढना चाहा। परन्तु किला देखने आये चहकते, मुस्कराते लोगों के सिवा कहीं कुछ न था। फिर Òी न जाने क्यांे उसे अनुÒव हो रहा था, मानों वह सैनिक अÒी Òी कहीं आस-पास खड़ा उससे कह रहा हो, ßसाब जी, कबzें केवल अपनी मौत मरने वालों के लिए बनाओ! कबzें बनानेे केे लिए तो लोगोें को मत मारो!!Þ

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डी-1@1, मेÄदूत अपार्टमेंट~स,
मरीन ड्राइव रोड, पो.-कदमा,
जमशेेदपुर--831005 ¼झारखंड½
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दूरÒाष:- 09431172954 0657--2310149.

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